15 November, 2017

नमक-गैर जरूरी भोजन, फायदे और नुकसान | ब्लॉग हिन्दी में सब कुछ


नमक हमारे भोजन का सबसे जरुरी अंग है। परम्परागत रूप से हम नमक का जरुरत से ज्यादा सेवन करते हैं, कुछ लोगों को तो ये भ्रान्ति भी है कि  नमक कम खाने की स्थिति में उन्हें कमजोरी आ सकती है। ‘
बिना नमक के भोजन असम्भव है’ इस तरह की धारणा प्रचलित है, इसी वजह से हमारा कोई भी भोजन (सिवा मिठाई के) नमक रहित होता है। हम प्राकृतिक रूप से स्वादिष्ट खाद्यों और विभिन्न सलाद और यहाँ तक कि फल  पर भी नमक  बुरक कर खाते हैं।
भोजन के साथ नमक का सेवन करने की वजह से हमारी किडनी को मूत्रनिर्माण की क्रिया के दौरान भारी मेहनत करनी पड़ती है। हमारे रक्त से नाइट्रोजन युक्त अवशिष्ट पदार्थ और पानी (ये दोनों मिलकर मूत्र बनाते हैं) को अलग करने के लिए किडनी की क्रियात्मक इकाई की नाजुक झिल्लियों पर दबाव पड़ता है.
भोजन में नमक की मात्रा अधिक होने से  मौजूद सोडियम और क्लोराइड के बार-बार  झिल्लियों के आर-पार गुजऱने से ये कमजोर हो जाती हैं। धीरे-धीरे इस प्रक्रिया से किडनी ही कमजोर होने लगती है,और फलस्वरूप किडनी fail या निष्क्रिय हो जाती है।
अधिक नमक की उपस्थिति हमारे शरीर में कैल्शियम  के शोषण को रोक देती है। सबसे बड़ी बात यह है कि नमक की अधिकता शरीर में बहुत से रोगों के उपजने का कारण  बनती है।

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कला श्री जी योगा, फिटनेस, घरेलू नुस्खे और सेहत आदि विषयो पर ब्लॉग लेखन करती है। उनके अनुसार जान है तो जहां है, जिसको ध्यान में रखते हुए आप सेहत से संबधित ही लेखन करती है।


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कविता के मायने | ब्लॉग बोल सखी रे


कविता के सिरहने पड़ी हैं
कितनी अबूझ पहेलियाँ,   
मेरा- तुम्हारा प्रेम,
हमारे सीले दिनों की यादें,
दर्द सिर पर रखे भारी समझौतों वाले दिन;
और कविता के पैताने!
वो हाँथ जोड़ कर बैठना,
कि एक दिन लौट आयेंगे हमारे भी दिन,
टपकना बंद हो जाएगा बरसात का पानी 
बच्चे के सिर पर,
मेघ करेंगे धरती से प्रेमालाप, 
हरियाली चादर ओढ़;
धरा करेगी स्वागत हमारी उम्मीदों का,
खाली पड़ी बखार भर जायेगी अनाज से, 

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अपर्णा बजपेयी जी जम्शेद्पुर में रहती है। आपने 2016 में ही ब्लॉग लेखन शुरू किया है और वर्तमान में झारखंड में आदिवासियों के बीच स्वास्थ, शिक्षा, आजीविका के मुद्दे पर काम कर रहीं है। दैनिक हिन्दुस्तान, जन संदेश टाइम्स, कथाक्रम तथा अन्य कई पत्र पत्रिकाओं में आपकी कविता और कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं।


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अवशेष | ब्लॉग एकलव्य


सम्भालो नित् नये आवेग 
रखकर रक़्त में 'संवेग' 
सम्मुख देखकर 'पर्वत' 
बदल ना ! बाँवरे फ़ितरत 
अभी तो दूर है जाना 
तुझे है लक्ष्य को पाना 
उड़ा दे धूल ओ ! पगले 
क़िस्मत है छिपी तेरी 
गिरा दे ! आँसू की 'गंगा'
धुल दे,पाप तूँ सारे 
मैं तो आऊँगा ! अक़्सर 

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ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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किन धागों से सी लूँ बोलो | ब्लॉग मन के पाखी


मैं कौन ख़ुशी जी लूँ बोलो।
किन अश्क़ो को पी लूँ बोलो।
बिखरी लम्हों की तुरपन को
किन धागों से सी लूँ बोलो।

पलपल हरपल इन श्वासों से
आहों का रिसता स्पंदन है,
भावों के उधड़े सीवन को,
किन धागों से सी लूँ बोलो।

हिय मुसकाना चाहे ही न
अधरों से झरे फिर कैसे ख़ुशी,
पपड़ी दुखती है ज़ख़्मों की,
किन धागों से सी लूँ बोलो।

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श्रीमती श्वेता सिन्हा जी ने सन 2017 से ही ब्लॉग लिखना शुरू किया है और तब से लेकर अब तक 150 से ऊपर रचनाएं लिख चुकीं है। उन्होने इतने कम समय में भी ब्लॉग दुनिया में अपनी व अपने ब्लॉग की बेहतर पहचसन बना ली है। वैसे इस पहचान के लिए उनके लेखन को ही इसका श्रेय दिया जा सकता है। उनसे ई-मेल swetajsr2014@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। 


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बाल दिवस | ब्लॉग अभिव्यक्ति


मन करता है
चलो आज मैं,
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ 
खेलूं कूदूं, नाचूँ, गाऊँ
उछल उछल इतराऊँ 
मन करता है...
खूब हँसूं मैं
मुक्त स्वरों मेंं 
धमाचौकड़ी मचाऊँ 
फिर माँ दौड़ी दौडी़ आए




शुभा मेहता सितम्बर 2013 से ब्लॉगिंग कर रही है और बचपन से ही पढ़ने की शौकीन है। उनके प्रोफाइल के अनुसार शुभा जी कहती है कि मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ।


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मायके में बिटिया रानी | ब्लॉग मन से


पलकों को आँचल से पोछा,
चेहरे पर मुस्कान सजाई,
जब देखी आंगन में मैंने,
अपने बाबुल की परछाई,
बार बार घड़ी को देखे,
जैसे समय को नाप रहे थे,
पल में अन्दर पल में बहार,
रस्ते को ही झाँक रहे थे,
देख मुझे सुध-बुध बिसराये,
घर के अन्दर ऐसे भागे,
जैसे उन बूढ़े पैरों में,
नये नवेले चक्के लागे,
भाग के आई मैया मेरी,
हाथों में एक थाल सजाये,
आँखों में ख़ुशी के आँसू,
दिल में कई अरमान बसाये,

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नीतू ठाकुर जी ने अक्टूबर 2017 में ब्लॉग लेखन शुरू किया है। अब तक आप अन्य समूह ब्लॉगों, चर्चा मंचों एवं वेब पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय रहती है।  


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13 November, 2017

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया | ब्लॉग मन से


कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया,
सोलह शृंगार से तन सजा तो लिया ,
संग तुम ले गये हो हमारा जिया,

बनके दीपक मै जलती रही रात भर,
एक पल भी हटी ना हमारी नजर,
इस तरह घिर के आई थी काली घटा ,
ऐसा लगता था जैसे ना होगी सहर

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया...

प्रीत की रीत हमने निभाई मगर, 
क्यों ना बन पाई प्रीतम तेरी हमसफ़र

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नीतू ठाकुर जी ने अक्टूबर 2017 में ब्लॉग लेखन शुरू किया है। अब तक आप अन्य समूह ब्लॉगों, चर्चा मंचों एवं वेब पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय रहती है।  


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लघु कथा.. गेट-टुगेदर | ब्लॉग अभिव्यक्ति


माँ ..माँ, बड़े भैया का फोन था, कह रहे थे इस दिवाली सब एक गेट टुगेदर रखते हैं ....बोलते हुए राघव ने कमरे में प्रवेश किया। अच्छा, सुधा की आँखे खुशी से छलछला उठी बोली, अच्छा कब आ रहे हैं सब ?
नहीं माँ, भैया कह रहे थे कि हम तीनों भाई और दीदी सब मिलकर कहीं एक जगह जाएंगे दो -तीन दिन के लिए ..घूमना भी हो जाएगा और गेट टुगेदर भी।
अरे तो वो सब यहाँ अपने, खुद के घर भी तो आ सकते हैं न, क्यों पहले भी तो हम सब साथ रहते थे न इसी घर में कितनी धमाचौकड़ी मचाते थे तुम लोग दिन भर और नीला, तेरी दीदी वो तो बात-बात में रूठ जाती थी और फिर तुम सब मिलकर उसे कैसे मनाते थे।
नहीं माँ, भैया कह रहे थे कि किसी रिसोर्ट में चलेंगे।
यहाँ कहाँ इतनी जगह है ...भाभियाँ, बच्चे सभी तो होंगे ...आजकल तो सभी को अलग कमरे चाहिए होते हैं न..
सुधा बोली, ठीक है, जैसा तुम लोगों को अच्छा लगे..
और फिर रोज फोन पर राघव अपने भाइयों के साथ इस गेट टुगेदर के बारे में बात करता, वार्तालाप के कुछ अंश उसे भी सुनाता। जाने का दिन व समय तय हो गया, एक अच्छे से रिसोर्ट में सबके अलग-अलग कमरे बुक हो गए। राघव ने उसे बताया ..माँ तुम्हारे लिए भी अलग कमरा बुक करवाया है भैया ने। दो दिन सब साथ रहेगें, कितना मजा आएगा न, राघव नें कहा।
राघव उसका सबसे छोटा बेटा, अभी पढाई कर रहा है, वो और राघव अभी यहीं अपने घर में रहते है। बच्चों के पिताजी तीन साल पहले ही हम सबको अलविदा कह गये। दोनों बडे बेटे अपने अपने परिवार को लेकर दूसरे शहरों म़े रहते है। बेटी अपने ससुराल म़े सुखी है, ओर क्या चाहिए उसे।



शुभा मेहता सितम्बर 2013 से ब्लॉगिंग कर रही है और बचपन से ही पढ़ने की शौकीन है। उनके प्रोफाइल के अनुसार शुभा जी कहती है कि मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ।


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आओ साईकिल को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनायें | ब्लॉग ऊंचाईयाँ


आओ बच्चों इस बाल दिवस पर
 एक प्रण निभायें,चलो साईकिल चलाये
सिर्फ बाल दिवस ही नहीं,
प्रतिदिन का यह नियम बनाये
साईकिल चलायें
साईकिल को अपनी 
दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

हाथ हों हैण्डल पर
पैर हों पैंडल पर
दृष्टि हो, चहुँ ओर,
आओ जीवन की 
रफ़्तार बढ़ायें।

तन-और मन को स्वस्थ बनायें
शुद्ध वातावरण में श्वासों की पूंजी बढ़ायें 
पेट्रोल, डीज़ल की जहरीली गैसों से 
वायुमण्डल को प्रदूषित होने से बचाएं।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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यदि आप गरदन दर्द से परेशान हैं, तो अपनाइएं ये उपाय | ब्लॉग आपकी सहेली


क्या आप गर्दन दर्द से परेशान हैं? यदि हां…तो यह लेख खास आप ही के लिए हैं। गर्दन दर्द से राहत पाने के लिए अपनाइए ये उपाय...जिससे बिना किसी दवा के 70 से 80 फ़ीसदी तक आराम हो सकता हैं! मैं कोई डॉक्टर नहीं हूं...लेकिन मैं गर्दन दर्द से पिछले 20-25 सालों से बहुत परेशान थी। इस साधे इलाज से मुझे 70 से 80 फ़ीसदी तक आराम हो गया हैं। इसलिए मुझे लगा कि मैं मेरा यह अनुभव मेरे जैसे गर्दन दर्द से पीड़ित जितने भी लोग हैं उन्हें बताउं ताकि इस भयानक तकलीफ़ से उन्हें छुटकारा मिले।
मैं ने अलग-अलग शहरों के लगभग 10-15 विशेषज्ञ डॉक्टरों से इलाज करवाया। डॉक्टरों के मुताबिक मुझे स्पॉन्डेलिसिस हैं और गर्दन की नसों में गैप आने से दर्द होता हैं। लगभग सभी ने एक ही तरह के व्यायाम बतायें। जैसे गर्दन को दाएँ-बाए घुमाना, नीचे-उपर करना और गोल-गोल घुमाना आदी (चीत्र1)। दवाइयाँ ज़रुर थोड़ी बहुत अलग-अलग थी।
डॉक्टर ने मुझे गर्दन का पट्टा बांधने दिया और किसी भी काम के लिए नीचे झुकने मना किया। जैसे भारतीय जनता ने भ्रष्टाचार और काला धन खत्म होने की उम्मीद में नोटबंदी की तकलीफ़े सहन की... ठीक वैसे ही मैं ने गर्दन दर्द में राहत मिलने की उम्मीद में दो-ढाई साल तक बिना किसी शर्म के (29-30 की उम्र में) गर्दन के पट्टे का इस्तेमाल किया। लेकिन जैसे भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ वैसे ही मेरा दर्द भी खत्म न होकर दिन-दुनी रात चौगुनी गति से बढ़ता गया। यदि मैं एक मिनट भी किसी से गर्दन तिरछी कर बात कर लेती तो मुझे एक पेनकिलर लेनी पड़ती! इसी बीच मैं ने वैद्य को बताकर मालिश भी करवाई। लेकिन कुछ भी आराम नहीं हुआ।

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ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


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11 November, 2017

मन का क्रंदन | ब्लॉग मन से


हार जाती हूँ , टूट जाती हूँ,
रूठ जाती हूँ खुद से,
जब समझ नहीं आता,
किस्मत क्या चाहती है मुझसे,
मिटती है उम्मीदे,
टूटते है सपने,
पराये से लगते है
सब लोग अपने,
गिरती हूँ ,संभालती हूँ,
घुटती  हूँ हर पल,
फिर भी मन कहता है,
अभी थोड़ा और चल,
कशमकश में गुजरी है
मेरी सारी ज़िंदगी,
क्यों करूँ भला मै
किसी और की बंदगी,
क्यों हो मेरे जीवन पर 

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नीतू ठाकुर जी ने अक्टूबर 2017 में ब्लॉग लेखन शुरू किया है। अब तक आप अन्य समूह ब्लॉगों, चर्चा मंचों एवं वेब पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय रहती है।  


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आरक्षण और बेरोजगारी | ब्लॉग नई सोच


जब निकले थे घर से, अथक परिश्रम करने,
नाम रौशन कर जायेंगे,ऐसे थे अपने सपने....
ऊँची थी आकांक्षाएं, कमी न थी उद्यम में,
बुलंद थे हौसले भी तब, जोश भी था तब मन में!!
नहीं डरते थे बाधाओं से, चाहे तूफ़ान हो राहों में!
सुनामी की लहरों को भी, हम भर सकते थे बाहों में


शिक्षित बन डिग्री लेकर ही, हम आगे बढ़ते जायेंगे।
सुशिक्षित भारत के सपने को, पूरा करके दिखलायेंगे।।
महंगी जब लगी पढ़ाई, हमने मजदूरी भी की ।
काम दिन-भर करते थे, रात पढ़ने में गुजरी।।
शिक्षा पूरी करके हम, बन गये डिग्रीधारी।
फूटी किस्मत के थे हम, झेलें अब बेरोजगारी।।


शायद अब चेहरे से ही, हम पढ़े-लिखे दिखते हैं!
तभी तो हमको मालिक, काम देने में झिझकते हैं....
कहते; "दिखते हो पढ़े-लिखे, कोई अच्छा सा काम करो !
ऊँचे पद को सम्भालो, देश का ऊँचा नाम करो"!!!

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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आखिर क्यो हुआ वायु प्रदूषण | ब्लॉग ऊंचाईयाँ


बड़ा ही चिन्तनीय विषय है,
वायु प्रदूषण, आखिर क्यों हुआ ये वायु प्रदूषण
इसका जिम्मेदार भी मनुष्य स्वयं ही है।
सृष्टिनिर्माता द्वारा धरती पर प्राकृतिक रूप से मनुष्यों के
उत्तम स्वास्थ्य हेतु सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई गयी  ।
प्रकृति की अनमोल सम्पदायें, वृक्ष, नदियाँ और सबसे महत्वपूर्ण साँस लेने के लिये शुद्ध स्वच्छ वायु ,जो प्रकृतिक रूप से सम्पूर्ण वायुमण्डल में है ।
यानि कि सृष्टिकर्ता द्वारा मनुष्यों के रहने के लिये सम्पूर्ण सुख-सुविधाओं से पूर्ण सृष्टि का निर्माण किया गया और कहा गया जाओ मनुष्यों धरती पर राज करो ।
परन्तु मनुष्यों को तो देखो आधुनिकता की दौड़ में, या यूँ कहिये आगे बढ़ना प्रकृति का नियम है । किसी भी देश की प्रग्रति और उन्नति नित-नये अविष्कार करने में है ,सुख-सुविधाओं के साधनों में बढ़ोत्तरी कोई बुरी बात भी नहीं है, परन्तु ऐसी भी प्रग्रति किस काम की ... या सुख-सुविधाओं के साधनों में इतनी भी बढ़ोत्तरी किस काम की जो स्वयं को बीमार कर दे.....
जरा सोचिए...... सृष्टिनिर्माता द्वारा प्राप्त वायुमण्डल जिससे हम मनुष्यों को प्राणवायु मिलती है .... उसी प्राणवायु को हमने जहरीला बना दिया .....दोषी कौन है ? दोषी हम सब मनुष्य स्वयम ही हैं ।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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08 November, 2017

देवों की धरती | ब्लॉग ऊंचाईयाँ


 देवों की भूमि "उत्तराखण्ड"
 "भारत"के सिर का ताज
गंगोत्री ,यमनोत्री,बद्रीनाथ,केदारनाथ
आदि तीर्थस्थलों का यहीं पर वास
पतित ,पावनी निर्मल ,अमिय माँ
गँगा का उद्गम गंगोत्री .. से 
हरी की पौड़ी ,हरिद्वार के घाटों में बहती
अविरल गँगा जल की धारा 
जन-जन पवित्र करता है अपना
तन-मन ।
भारत को सदा-सर्वदा रहा है 
जिस भूमि पर नाज़, वहीं उत्तराखण्ड 
पर बन रक्षा प्रहरी खड़ा है विशालकाय 
पर्वत हिमालय .....

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सुरमई अंजन लगा | ब्लॉग मन के पाखी


सुरमई अंजन लगा निकली निशा।
चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।।

सेज तारों की सजाकर 
चाँद बैठा पाश में,
सोमघट ताके नयन भी
निसृत सुधा की आस में,
अधरपट कलियों ने खोले,
मौन किरणें चू गयी मिट गयी तृषा।

छूके टोहती चाँदनी तन 
निष्प्राण से निःश्वास है,
सुधियों के अवगुंठन में 

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श्रीमती श्वेता सिन्हा जी ने सन 2017 से ही ब्लॉग लिखना शुरू किया है और तब से लेकर अब तक 150 से ऊपर रचनाएं लिख चुकीं है। उन्होने इतने कम समय में भी ब्लॉग दुनिया में अपनी व अपने ब्लॉग की बेहतर पहचसन बना ली है। वैसे इस पहचान के लिए उनके लेखन को ही इसका श्रेय दिया जा सकता है। उनसे ई-मेल swetajsr2014@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। 


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