19 February, 2016

बोलने की आजादी है, तो गद्दार को शहीद कहोगे?

आतंकवादी अफजल गुरू का महिमामंडन...पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे...कथित आज़ादी लेने के नारे...ये नजारा पाकिस्तान की सरजमीं  का नहीं है। गला फाड़-फाड़ कर गद्दार अफजल गुरू और दुश्मन मुल्क पाकिस्तान की जयजयकार हिंदुस्तान में हो रही है। वो भी किसी दूरदराज के इलाके में नहीं...देश की राजधानी दिल्ली में। दिल्ली में भी किसी नुक्कड़ या घिची पिची गलियों में नहीं...देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नाम पर बने और जेएनयू के नाम से विख्यात यूनिवर्सिटी में। 
     बेशर्मी का ये नजारा हिंदुस्तान में ही हो सकता है। उस भारत में जहां अभिव्यक्ति की आजादी है। ये भारत ही है जहां बोलने की आजादी को भौंकने की आजादी समझ लिया जाता है।बेशर्मी की हद ये कि वीडियो कैमरों के सामने गद्दार अफजल गुरू का महिमामंडन और दुश्मन मुल्क ज़िंदाबाद के नारे लगाने से ये पढ़े-लिखे बाज नहीं आए। बेहयापन ये कि यूनिवर्सिटी के किसी प्रोफेसर ने आगे बढ़कर तत्काल इन लोगो के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराने की नहीं सोची।
     मीडिया के लगातार हल्ला मचाने पर पहले तो ये छात्र नेता अपनी बात से मुकर गए। जब गद्दारों का समर्थन करने वाले वीडियो मीडिया में चलने लगे, तो ये अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात उठाने लगे। कमाल की बोलने की आज़ादी, एक आतंकी गद्दार को शहीद कहने की आजादी। दुश्मन देश पाकिस्तान ज़िंदाबाद बोलने की आज़ादी। सरकार के किसी कदम का विरोध करना, और जोरदार विरोध करना एक बात है, मगर उसकी आड़ में गद्दारों आतंकवादियों की जय-जयकार करना सरासर देश के साथ गद्दारी है।
   देश की सबसे पुरानी पार्टी के नेता बिना ''किंतु-परंतु'' लगाए बयान जारी नहीं कर रहे। साफ पता चल रहा है कि उनकी हरचंद कोशिश है कि उनके किसी बयान से ऐसा नहीं लगे की वो बीजेपी सरकार के साथ हैं। लानत है ऐसी राजनीति पर। धर्म विशेष के वोटों की राजनीति में इस स्तर तक चले गए हैं सियासतदां, जिसे सोचकर हमें ही शर्म आने लगी है।
    मीडिया की जुतमपैजार के बाद जब पुलिस कार्रवाई करने लगी, तो वही हुआ जिसका अनुमान हर किसी को था। पहले कांग्रेस नेता नसीहत देने लगे कि बीजेपी के लोगो पता कर लें कि देशद्रोह होता क्या है, फिर दुश्मनों की जयकार करते छात्रों की गिरफ्तारी शूरु हुई तो वामपंथी हल्ला लगाने लगे कि ये उनके समर्थकों पर हमला है। जनता समेत किसी की समझ में नहीं आ रहा कि आखिर एक गद्दार को शहीद कहने वालों पर कार्रवाई हो रही है तो नेता इतना शोर क्यों मचा रहे हैं?
       वैसे लोग ये भी पूछ रहे हैं कि पुरूस्कार लौटाने वाले, और असहिष्णुता का राग अलापने वाले नौटंकीबाज साहित्यकार कहां हैं? क्या आमिर खान के लिए गद्दारी और दुश्मन मुल्क के जिंदाबाद के नारों से बड़ी समस्या असहिष्णुता है? लगता है जबतक मीडिया इन फिल्मस्टारों और कथित साहित्यकारों के मुंह के आगे कैमरा नहीं लगाएगा ये जुबान नहीं खोलेंगे। हालांकि 48 घंटे गुजरने के बाद भी अबतक असिहष्णुता की बात करने वाला कोई स्टार अपने ट्विटर एकाउंट पर भी अवतरित नहीं हुआ है। असहिष्णुता का शोर मचाने वाले साहित्याकरों के बारे में तो खैर कुछ कहना ही बेकार है।  
     बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। गद्दारों की लिस्ट में शामिल इशरत जहां को अपनी बेटी बताने वालों को भी शर्म नहीं आ रही। आतंकवादी हेडली ने जब बता दिया कि इशरत जहां भी आतंकवादी थी, तब भी इशरत जहां के समर्थन में बोलने वालों की जमात कम नहीं है। उसपर तुर्रा ये कि अब बात को पलटते हुए कई नेता कहने लगे हैं कि वो इशरत जहां के एनकाउंट के फर्जी होने की बात उठा रहे थे।शर्म आनी चाहिए ऐसे नेताओं को, मगर अफसोस ये है कि वोटों की राजनीति में इन रंगे सियारों को लोग अपना हितैषी समझते हैं।  
    वैसे पुलिस चाहे तो चंद मिनटों में डंडा पेलकर इस गद्दार समर्थक लोगो को हमेशा के लिए सबक सीखा सकती है। पर पुलिस भी करे क्या, अगर वो कोई सख्त कदम उठाती है, तो विपक्ष और वोटो की राजनीति करने वाले सियासतां इनकी जान के पीछे पड़ जाते हैं। वैसे ये अलग बात है कि डंडे की ताकत अक्सर बिना आदेश के भी पुलिस दिखाती है, पर ज्यादातर गरीबों पर।
     आखिर समझ नहीं आता कि पाकिस्तान से इन लोगो को इतना प्यार क्यों है? इन्हें कब और कहां पाकिस्तान में सहिष्णुता के दर्शन हो गए? हाल ही में पाकिस्तान में एक आम नागरिक, जो कि विराट कोहली का फैन था, उसने अपने घर पर तिरंगा फहरा दिया, तो पाकिस्तानी पुलिस ने उसे जेल भेज दिया, लेकिन हमारे देश में तो खुलेआम राजधानी में जेएनयू में पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाकर ये लोग आजादी से घूम रहे हैं,
         ये वो जेएनयू है जिसे हर साल सरकार से सहायता और सब्सिडी के नाम पर 244 करोड़ रुपए मिलते हैं। यहां 8 हज़ार 308 छात्र पढ़ते हैं।सवाल ये है कि आखिर देश के खर्चे पर चलने वाली यूनिवर्सिटी में कैसे दुश्मन देश पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग सकते हैं। यहां पढ़ने वाले छात्र हैं, या पाकिस्तान के पिठ्ठू। कैसे यहां देश की सबसे बड़ी आदलत के आदेश पर फांसी पर लटकाए गद्दार आतंकवादी को शहीद कहा जाता है? कैसे उसकी सजा को ज्यूडिशियल किलिंग कहककर नारे लगाए जाते हैं? आखिर कश्मीर की तथाकथिक आजादी के नारे लगाने की इन छात्र नेताओं की जुर्रत कैसे हुई? कैसे इन छात्र नेताओं को कश्मीर से भगा दिए गए हिंदुओं का दर्द नहीं दिखता। आखिर कैसे? 
      मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे पूरे देश में एक साजिश की तरह इस तरह की बातें फैलाई जा रही हैं। खासतौर से जबसे नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी सत्ता में आई है। पहले गद्दार याकूब की फांसी के नाम पर, फिर एक अखलाक के मरने के बाद टोलरेंस यानि असहिष्णुता के नाम पर देश को पुरी दुनिया में बदनाम किया गया। लगता है कि नेताओं में मुस्लिम वोटों की भूख बढ़ गई है हर मौत को धर्म या जाति विशेष में बांट दें। एक अखलाक की मौत के बाद उसके परिवार को करोड़ों की मदद दे दी गई। सो कॉल्ड साहित्याकरों ने पुरूस्कार लौटा दिए। इतने पर ही चैन नहीं हुआ तो दलित वोटो के लालच में याकूब का समर्थन करने वाले एक छात्र की आत्महत्या पर भी रोटी सेंकने पहुंच गए, मगर किसी अन्य छात्र की मौत पर ये कहीं नजर नहीं आए।     
इतनी बड़ी बात होने के बाद भी पार्टियां बाज नहीं आ रही हैं। हालात तो ये है कि सबको एक सुर में बोलना चाहिए था, पर फिर भी 
    आखिर इन कथित सेकूलर लोगो की भीड़ अब कहां है, जब जेएनयू में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं। प्रेसक्लब में गद्दार आतंकवादी अफजल गुरू को शहीद का दर्जा देने वाले पोस्टर लग रहे हैं। आखिर गद्दारों का समर्थन करने वालों को कैसे किसी धर्म का इंसान अपना समझ सकता है। कैसे आईएस जैसे हवशी दरिंदों और बलात्कारियों के संगठन के पक्ष में लड़ने गए लोगो को भटका हुआ नौजवान कहा जा सकता है।
      बोलने की आजादी के नाम पर देश विरोधी नारे लगाने वाले इन छात्रों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलना  चाहिए। इन लोगो को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। देश की जनता को सहिष्णुता और बोलने की आजादी का मतलब समझना होगा, ताकि वो समझ सके कि कौन राजनीति कर रहा है। देश को सिर्फ  इन सेक्यूलरनेताओं, सो कॉल्ड साहित्यकारों और असहिष्णु का नारा लगाने वाले स्टारों के हाथ में नहीं छोड़ा जा सकता।



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