09 August, 2016

Kailash Sharma - Best Blogger of the Month, July 2016

Best Blogger of the Month - July 2016 के लिए iBlogger.in की टीम द्वारा नई दिल्ली के कैलाश शर्मा जी का चयन किया गया है। कैलाश जी 2010 में Blogging दुनिया से जुड़े और आजतक अपने Blogs के माध्यम से हिन्दी साहित्य को अनमोल योगदान दे रहे है।
कैलाश जी का जन्म 20 दिसम्बर, 1949 में हुआ और उन्होने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त की है। उन्हे द्धितीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन, लखनऊ में वर्ष के श्रेष्ठ बाल कथा लेखन के लिए ‘तस्लीम परिकल्पना सम्मान- 2011’ से नवाजा जा चुका है। इस उपलब्धि के साथ ही प्रकाशक हिन्द युग्म, नयी दिल्ली द्वारा उनकी एक पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद) प्रकाशन किया जा चुका है। कैलाश जी की रचनाओं को देशभर की विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं और कविता संग्रहों ने स्थान दिया है। उन्होने केंद्रीय सचिवालय सेवा एवं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में विभिन्न प्रशासनिक पदों पर अपनी सेवाएं दी हैं और वर्तमान में वे रिटायर्ड होकर पूर्ण रूप से Blogger है। वर्तमान में कैलाश जी चार Blogs का संचालन और लेखन कर रहे है, ये सभी Blogs अलग-अलग विषयो से संबधित है।


कैलाश जी का पहला Blog Kashish - My Poetry है, यह Blog कविताओं को समर्पित है। यहां 13 जुलाई 2010 को प्रकाशित पहली पोस्ट ‘आयेगा कहाँ से गाँधी’ के माध्यम से उन्होने समाज को एक दिशा देने की कोशिश करना एक सार्थक प्रयास रहा और दमदार रहा। आप स्वयं पढ़े..

हिन्दू भी यहाँ है, मुस्लिम भी यहाँ है,
हर धर्म के अनुयायी की पहचान यहाँ है।
मंदिर मैं मिले हिन्दू,मस्जिद मैं मुसल्मन थे,
वह घर न मिला मुझको, इन्सान जहाँ है।


इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कैलाश जी आजतक 311 कविताओं की रचना कर चुके है। उन्होने अपने Blog के माध्यम से समाज की बुराईयों के खिलाफ आवाज उठाई है। वहीं उन्होने जिन्दगी के कई अनमोल पहलुओं का मार्मिक रूप पाठक के सामने पेश करने का भी प्रयास किया है। कहीं-कहीं उन्होने प्रकृति के सौन्दर्य का भी वर्णन किया है। उनके Blogs में 28 नवम्बर, 2013 को प्रकाशित एक कविता जिसमें उनकी दार्शनिक सोच दिखाई पड़ती है।

स्वयं का अस्तित्व

अपने स्वयं का अस्तित्व
अपने ही अन्दर
न भागो अपने आप से,
तुम्हारा अपना स्वत्व ही
तुम्हारा मित्र या शत्रु,
प्रज्वलित होती अग्नि
अच्छाई या बुराई की
स्वयं अपने अंतस में,
व्यर्थ है दोष देना
किसी बाहरी शक्ति को।
दिखाता रास्ता अपना ही ‘मैं’
आगे बढ़ने का जीवन राह में।


कैलाश जी ने अपने दूसरे Blog ‘आध्यात्मिक यात्रा’ के माध्यम से ‘अष्टावक्र गीता’ को हिन्दी पद्य व अंग्रेजी में अनुवाद कर पाठको को उपलब्ध करा रहे है। यह Blog उन्होने 23 मार्च, 2012 में ‘वन्दना’ पोस्ट के साथ शुरू किया था। उन्होने इस Blog को लगभग एक वर्ष के लिए छोड़ दिया था लेकिन पुनः 18 जनवरी, 2014 को दुबारा लिखना शुरू किया, जोकि अब तक सक्रिय है।

‘आध्यात्मिक यात्रा’ Blog को पढ़े!!!

उनका तीसरा Blog ‘बच्चो का कोना’ जोकि पूर्णतयाः बालमन को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। यहां पर उन्होने बच्चों की रूचि को ध्यान में रखते हुए संदेशात्मक बाल रचनाओं को सृजित किया है। यह Blog उन्होने 27 जनवरी, 2011 को बनाया था। उन्होने विभिन्न कहानियों और प्रेरक प्रसंगो को कविताओं में पिरोकर पेश किया है, जिसका लाभ बच्चों को अच्छे संस्कार के रूप में मिल सकता है। इसके साथ ही ये कविताएं ज्ञानवर्द्धक और मजेदार भी है। कुल मिलाकर कह सकते है कि उन्होने बालमन को समझते हुए उन्ही की भाषा में उन्ही के लिए लिखा है। उनके ब्लॉग में 16 जनवरी, 2014 को प्रकाशित एक रचना..

सूरज भैया बाहर आओ,
इस सर्दी से हमें बचाओ।
ओढ़ रजाई तुम कोहरे की
बड़े मज़े में सोए रहते.
ठंड और कोहरे के कारण
हम हैं क़ैद घरों में रहते।


कैलाश जी का चौथा Blog ‘बातें-कुछ दिल की, कुछ जग की’ है, जिसका आधार सामाजिक व प्रेरक कहानियां, प्रसंग, सामाजिक मुद्दो और पुस्तको की समीक्षाए है। इस Blog की शुरूआत उन्होने ‘दुर्गा पूजक देश में कन्या भ्रूण हत्या’ शीर्षक के साथ 30 सितम्बर, 2011 में की। इस Blog के माध्यम से उन्होने समाजाजिक बुराईयों को मुहतोड़ जवाब देते हुए समाज को आईना दिखाया है। उदाहरण के लिए 22 नवम्बर 2011 को प्रकाशित लेख आप पढ़ सकते है।

हमारी सम्वेदना और सहनशीलता क्यों मर रही हैं ?

बचपन से हमें सिखाया जाता रहा है कि संवेदनशीलता और सहनशीलता सफल जीवन के मूल मन्त्र हैं। हमारे सभी प्राचीन ग्रन्थ और सभी धर्म सहनशीलता और सहअस्तित्व का महत्व बताते रहे हैं। लेकिन आज हम जब अपने चारों ओर नज़र डालते हैं तो देखते हैं कि हम अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और धार्मिक जीवन में कितने असंवेदनशील और असहिष्णु होते जा रहे हैं।
सड़क पर गाड़ी को ओवर टेक करने के लिये जगह न देने पर दूसरी कार के ड्राईवर से झगडा करना और फिर गोली मार देना, दो गाड़ियों का हलके से छू जाने पर भी गाली गलौज और फिर एक दूसरे पर हथियारों से हमला, ये समाचार आजकल लगभग प्रतिदिन पढने को मिल जाते हैं। एक दो दिन पहले ही समाचार पत्र में था कि एक व्यक्ति की गाड़ी से दूसरे व्यक्ति की गाड़ी को मोडते समय कुछ खरोंच लग गयी तो उसने अगले चौराहे पर उस पर गोली चला दीं और एक गोली उसके ज़बडे में लगी और उसकी हालत चिंता जनक है।
दूसरी घटना में एक चालक द्वारा गाड़ी पीछे करते हुए उसकी गाड़ी दूसरी गाड़ी के बम्पर से टकरा गयी और इसके बाद झगड़ा बढने पर एक व्यक्ति ने हवा में गोलियां चला दीं। आज से 20 साल पहले सड़क पर गाड़ी चलाते समय दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों के प्रति सहनशीलता और सौहार्द का भाव और यातायात नियमों का पालन करना प्रत्येक व्यक्ति की एक स्वाभाविक प्रवृति थी और रोडरेज जैसे शब्दों से शायद सभी अनजान थे। यह सही है कि आज वाहनों की संख्या बढने से सडकों पर वाहनों की भीड़ ज्यादा हो गयी है, लेकिन बढती हुई दुर्घटनाओं और रोडरेज का केवल यही कारण नहीं है। आज तो बुजुर्ग और शरीफ़ आदमियों को इस तरह की घटनाओं को देख कर दिल्ली में सड़क पर गाड़ी चलाते हुए हर समय एक भय और आशंका बनी रहती है।

‘बातें-कुछ दिल की, कुछ जग की’ Blog को पढ़े!!!


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