10 November, 2016

झूला - एक कविता (ब्लॉग अभिव्यक्ति से)


एक वृक्ष कटा
साथ ही
कट गई
कई आशाएँ
कितने घोंसले 
पक्षी निराधार
सहमी चहचहाहट
वो पत्तों की 
सरसराहट
वो टहनियाँ
जिन पर 
बाँधते थे कभी
सावन के झूले
बिन झूले सावन
कितना सूना
कटा वृक्ष
वर्षा कम
धरती सूखी
पड़ी दरारें
न वृक्ष
न झूला 
न सावन ?


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शुभा मेहता सितम्बर 2013 से ब्लॉगिंग कर रही है और बचपन से ही पढ़ने की शौकीन है। उनके प्रोफाइल के अनुसार शुभा जी कहती है कि मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ।


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