21 November, 2016

मेरे अनुभव ( गाँठें )


बच्चे बगीचे में खेल रहे थे, कोई दौड़ रहा था, कोई रस्सी कूद रहा था। मैं बेंच पर बैठकर उन्हें देख रह थी। कितने निष्फिक्र थे सभी। अचानक एक बच्ची मेरे पास आकर बोली, "आंटी, देखो न, हमारी रस्सी में गाँठ पड़ गई है क्या आप इसे खोल देगीं।" मैंने कहा, क्यों नहीं, देखो अभी खोल देती हूँ। इतना कह मैंने रस्सी हाथ में ली तो देखा अभी तो गाँठ ढीली है, झट से खोल कर उसे दे दी। बच्ची खुश होते हुए धन्यवाद बोलकर फिर खेलने में मगन।
इधर मैं सोचने लगी चलो आसानी से खुल गई गाँठ, अभी ज्यादा कसी नही थी न।
दोस्तों, हम भी जाने-अनजाने रोज ऐसी कई गाँठें अपनें मन रूपी धागे में लगा लेते हैं, जिन्हें अगर समय रहते खोल न लिया जाए तो वो कसती ही जाती हैं और करती हैं हमें तनावग्रस्त, लाख कोशिशों बावजूद हम उन्हें खोल नहीं पाते।
कभी किसी की कही बात से मन को ठेस पहुँचती है और फिर बँध जाती है गाँठ। और चल पडते हैं हम नकारात्मकता की ओर, मन के हर कोनें में संग्रह करते जाते हैं गाँठों को।



शुभा मेहता सितम्बर 2013 से ब्लॉगिंग कर रही है और बचपन से ही पढ़ने की शौकीन है। उनके प्रोफाइल के अनुसार शुभा जी कहती है कि मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ।


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