04 January, 2017

आपकी सहेली | क्या सांवली या काली रंगतवाले इंसान नहीं होते?


आपकी सहेली ब्लॉग पर आपको विभिन्न मुद्दो पर लेख इत्यादि पढ़ने को मिल जायेंगे। वही इस सप्ताह उक्त ब्लॉग की संचालिका ने इस बार सावंली रंगत वाले लोगो की पीड़ा को दिखाया है। साथ ही समाज में फैली हुई भ्रान्तियों से पाठक को अवगत कराने का प्रयास किया है। जिसे आप पढ़कर ही बेहतर समझ पायेंगे।

क्या सांवली या काली रंगतवाले इंसान नहीं होते? उनके सीने में दिल नहीं धडकता? वे हाडमांस के बने नहीं होते? मोटा, काला-सांवला या कुरुप, कोई अपनी पसंद से तो डिजाइन होकर नहीं आता! जैसा भगवान ने बनाया, हम वैसे ही तो होंगे! फ़िर ऐसा क्या है कि सांवली रंगतवालों के प्रति हमारे मन में एक तरह का नफ़रत भरा भाव रहता है। दुनिया की नफरत बर्दास्त करते-करते ज्यादातर सांवली या काली रंगतवाले हीनभावना से ग्रसित क्यो हो जाते है? क्या सांवला या काला होना कोई गुनाह है...??

अलग-अलग रंगों से जुडी हमारी भ्रांतियां

हम काले रंग को कुरुपता का प्रतिक मानते है। इसकी असली वजह अलग-अलग रंगों से जुडी हमारी भ्रांतियां है। सफेद रंग को शुध्दता, स्पष्टता और स्वच्छता का प्रतिक माना जाता है, तो काला रंग ठीक इसके विपरीत है। सफेद स्वच्छ है और काला गंदा। क्या चमडी के रंग के आधार पर लोगों के बारे में धारणा बनाते हुए हम इसी बात से प्रभावित होते है? आखिर ऐसा क्या है जो हमें गोरेपन के पिछे भागने को मजबूर करता है? लडकों की अपेक्षा लडकियों को सांवली या काली रंगत होने से ज्यादा दुश्वारियां सहन करनी पडती है। सांवली रंगतवाली लडकियों के पिता को उनके शादी में ज्यादा दहेज देना पडता है। लडकियों को बचपन से ही घुट्टी की तरह यह वाक्य पिलाया जाता है, “अच्छी नौकरी चाहिए, ब्वॉयफ्रेंड और पति की दरकार है तो भले पढ़ो-लिखो नहीं लेकिन गोरी-चिट्टी जरुर बनी रहना।" शायद इसी सोच की बदौलत “धुप में निकला न करों रुप की रानी...”, “गोरी है कलाइयां...” जैसे गानों की भरमार हैं और “मोहे श्याम रंग दई दे...” जैसी कविताएं इक्का-दुक्का ही नजर आती है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का एक बयान आया था, "अगर राजीव गांधी ने किसी नाइजीरियन से शादी की होती तो क्या कांग्रेस के कार्यकर्ता उसका नेतृत्व स्वीकार करते?"
सफेद रंग सुंदरता का अकेला मापदंड नहीं हो सकता। वास्तव में चमडी तो केवल हमारे शरीर का नाजुक आवरण भर है। इसकी मोटाई दो मिलीमीटर से ज्यादा नहीं होती। इसका मुख्य काम शरीर के अंगों की सुरक्षा करना है। इंसान की सुंदरता का आकलन केवल उसके बाहरी आवरण से नहीं हो सकता। एक आदमी रंगबिरंगे हीलियम गैस के गुब्बारे बेच रहा था। एक बालक ने आकाश में उंचे उठते हुए गुब्बारों को देखकर उस आदमी से पुछा, "अंकल, आपके गुब्बारों में क्या काले रंग का गुब्बारा भी उड सकता है?" उसने कहा, "बेटे, गुब्बारा अपने रंग के कारण नहीं उडता। गुब्बारे के भीतर जो विश्वास और शक्ति भरी हुई है, उसी की बदौलत वह उपर उठता है।" मनुष्य के विकास में भी न तो उसका गोरा रंग सहायक होता है और न ही उसका काला रंग बाधक है। हां, सुरवात में कठिनाईयां आ सकती है लेकिन अपने आत्मविश्वास से सांवली या काली रंगत वाले इंसान भी आसमान की उंचाइयों को छू सकते है। विश्वसुंदरियों की श्रृंखला में दक्षिण अफ्रिका की महिला भी विश्व-सुंदरी का खिताब जीत चुकी है। जबकि दक्षिण अफ्रिका के लोग कितने काले होते है! सीधी सी बात है कि गुब्बारा अपने काले रंग के कारण नहीं बल्कि उसके भीतर जो कुछ है, उसी के बल पर उपर उठता है।

<<< पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें >>>



ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


यदि आप भी अपनी ब्लॉग पोस्ट को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचाना चाहते है। तो अपने ब्लॉग की नई पोस्ट की जानकारी या सूचना हमें दें। अपनी ब्लॉग की पोस्ट शेयर करने के लिए अपने ब्लॉग पोस्ट का यूआरएल और अपने बारे में संक्षिप्त जानकारी एवं फोटो सहित हमें - iblogger.in@gmail.com पर ई-मेल करें।

No comments:
Write टिप्पणियाँ


Blog this Week

loading...