27 January, 2017

अवसर को पकड़ो


जीवन में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जिस पर बरसों का भाग्य निर्भर करता है। इसलिए हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में अनुकूल अवसर बहुत ही कम होता है। अगर हम उस क्षण से चूक जाते है तो हमारा पूरा जीवन व्यर्थ हो जाता है। जिस व्यक्ति का मन कर्मशील होता है उसके लिए जीवन में अवसर ही अवसर है। जीवन में फैसले करने वाले क्षण अत्यन्त छोटे होते हैं। हम तभी कामयाब हो सकते हैं जब हमारे अन्दर अवसर को पकड़ने की योग्यता आ जाये। तो आइये इस छोटे से प्रसंग के माध्यम से जाने- जीवन में अवसर के महत्व को :

श्री हर्बट ब्रीलैन्ड न्यूयॉर्क नगर में प्रतिदिन 10 लाख यात्रियों के परिवहन की व्यवस्था के अध्यक्ष थे। कुछ ही समय हुआ था उन्हें उनके सहयोगियों ने एक लाख डॉलर का वेलेण्टाइल पुरस्कार दिया था। यह पुरस्कार उन्होंने इसलिए प्राप्त किया क्योंकि उनके संरक्षण में जो जायदाद रखी गई थी उसकी अत्युत्तम व्यवस्था से सभी सहकर्मी बहुत प्रसन्न हुए थे। कुछ न्यूयॉर्क निवासियों को उस दिन पहली बार इस बात का पता चला जबकि इस बात को देश के विशेषज्ञ बहुत समय से जानते थे कि न्यूयॉर्क के व्यस्त और भीड़भाड़ वाले रास्ते पर प्रतिदिन जो गम्भीर टक्करें व जनता के लिए असुविधाजनक बातें नहीं होती वह सब अकस्मात या अपने आप नहीं हो रहा है बल्कि यह अत्यन्त उत्तम यातायात व्यवस्था का परिणाम है। इस व्यवस्था के अध्यक्ष के रूप में जो व्यक्ति है वह अत्यन्त शांत है पर शक्तिशाली है। उसमें नेतृत्व करने की बड़ी योग्यता है। वह सड़क पर चलने वाले आदमी के साथ-साथ उसका मित्र भी है।

30 साल पहले 13 मास का बालक था ब्रीलैन्ड। वह शहर के अन्य मज़दूरों के साथ बर्फ की गाड़ियाँ लादने का कार्य करता था। एक बार उसने चढ़ती उम्र में किराये की गाड़ी हाँकने का काम भी किया था। वह 10 वर्ष का हुआ तो रेलमार्ग के काम में लग गया। शुरू-शुरू में तो 'लाँग आइलैन्ड रेलमार्ग कम्पनी' की रात्रि निर्माण गाड़ियों में बेलचे से रोड़ी लादने का काम करता था। उसकी महत्वाकांक्षा थी कि मैं रेलमार्ग का प्रधान कार्यकर्ता बनूँ। उसने पक्का निश्चय कर रखा था कि मैं इसके लिए पूरा प्रयत्न करूँगा। कुछ समय के बाद उसने एक डॉलर रोज़ पर रेल के रास्ते व स्लीपरों के निरीक्षण का कार्य शुरू किया। श्री ब्रीलैण्ड का कहना था कि उस दिन मैंने यह अनुभव किया कि मैं निगम की अध्यक्षता की ओर ले जाने वाले मार्ग पर आ गया हूँ।

इसके बाद उन्हें स्विचमैन बना दिया गया। बुशविका का स्टेशन बहुत दूर नहीं था। उन्होंने वहाँ के कर्मचारियों से जान-पहचान बना ली और अपनी सेवाएँ पेश कर दी कि जब भी काम पर न होऊँ मुझे क्लर्की की सेवा पर आमान्त्रित कर लें। यह बात ठीक वही थी जो श्री ब्रीलैन्ड चाहते थे, और वे चाहते यह थे कि उन्हें ऊपर से नीचे तक रेलमार्ग के कार्यों की पूरी जानकारी प्राप्त करनी है। उनका कहना था कि कई बार मैंने उस छोटे से स्टेशन पर रात 11-12 बजे तक काम किया। मैं गाड़ियों के इन्जन का, यात्रियों का, क्रय मूल्य का पूरी तरह से हिसाब रखता था। इस जानकारी के परिणामस्वरूप मैंने रेलमार्गों के विस्तार की भी जानकारी ली। ऐसा ज्ञान कम ही प्रबन्धकों को होता है। मैंने इस कार्य की सब शाखाओं का किसी न किसी रूप में ज्ञान प्राप्त कर लिया।

उनका स्विचमैन का कार्य अस्थाई था इसलिए जब कार्य समाप्त हो गया तब वे सेवामुक्त कर दिये गये। उनका कहना था कि वह बात बिल्कुल मेरे मन के अनुकूल न थी। मैं रेलमार्ग के एक अफसर के पास गया और कहा- 'मैं लाँग आइलैन्ड रेलमार्ग कम्पनी में रहना चाहता हूँ। मुझे आप जो भी पद देंगे मन्जूर होगा। यदि आप मुझे कार्य दे दे तो मैं आपका आभारी रहूँगा।' पहले उसने कहा-मेरे पास तुम्हारे लिए कोई कार्य नहीं है। परन्तु अन्त में कहा कि यदि तुम दूसरे विभाग में जाने के लिए तैयार हो तो मैं तुम्हें कार्य दे सकता हूँ। तुम्हें रेलगाड़ियों में झाडू लगाने का कार्य करना होगा। मैंने एकदम स्वीकार कर लिया और इस प्रकार रेलमार्ग के महत्वपूर्ण पदों की जानकारी विस्तार पूर्वक प्राप्त कर लिया। अतिशीघ्र ही उन्होंने मुझे मालगाड़ी के ब्रेक नियन्त्रण के कार्य पर नियुक्त कर दिया। उस दिन मैंने अनुभव किया कि दुनिया में मेरी भी कोई कीमत है। दो साल रेलमार्ग के प्रशिक्षण के बाद मुझे अभी चालीस डॉलर प्रतिमाह मिल रहे थे। मैं खाने पर 18 डॉलर खर्च करता था तथा 20 डॉलर अपनी माँ और बहन के लिए घर भेज देता था। रेलमार्ग में काम करने वाले श्री ब्रीलैन्ड के साथी शीघ्र ही समझ गये कि वह महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं। रेलमार्ग के अध्यक्ष बनने का उसका दृढ़ निश्चय है। उसे ‘प्रेजीडेट ब्रीलैन्ड‘ नाम से ही वहाँ काम करने वाले लड़के पुकारते थे। उन्हें यह भी कहा गया कि तुम शायद कंडक्टर के पद तक पहुँच जाओ परन्तु इससे ऊपर नहीं जा पाओगे।

जब वे कंडक्टर बन गये तो अपनी उत्कृष्ट योग्यता के कारण उन्हें इन पुराने ब्रेकमैनों से ऊँचा दर्जा दिया गया। किन्तु वहाँ एक दिन दुर्घटना हो गई जिसमें श्री ब्रीलैण्ड तथा इंजीनियर दोनों संयुक्त रूप से जिम्मेवार थे। उन्होंने अपनी जिम्मेवारी को स्वीकार किया और दोनों सेवामुक्त कर दिये गये।

ब्रीलैन्ड का कथन था कि मैं फिर से सुपरिटेंडेंट के पास गया और इस बात का दृढ़ता से कहा कि मुझे नौकरी पर रखना चाहिए। उसने मुझे ब्रेकमैन के पद पर रख दिया मैंने वह भी स्वीकार कर लिया। शीघ्र ही रेलमार्ग के मालिक बदल गये और नये प्रबन्धक ने यह स्वीकार कर लिया कि ब्रीलैन्ड असाधारण योग्यता वाला युवक है। अतिशीघ्र ही उसकी परीक्षा भी हो गई।

जब रेलमार्ग के मालिक एक बार फिर बदले गये तो जनरल मैनेजर अपने कार्य से बिल्कुल अन्जान था। अपने कार्य को ठीक प्रकार से करने के लिए उसे ब्रीलैन्ड पर निर्भर होना पड़ता था। इसके बाद अन्य ऊँचे अधिकारियों ने उसके कार्य को जाना तथा उनका व्यक्गित रूप से परीक्षण किया। तब उन्हें पता चल गया कि श्री ब्रीलैन्ड ऐसे व्यक्ति हैं जो न्यूयॉर्क की 'मेट्रोपोलिटन स्ट्रीट रेलवे कंपनी' के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं।

इस उल्लेखनीय सफल जीवन के विषय में मैं यही कहूँगा कि उनमें अवसर को पकड़ने तथा कार्य करने की, दोनों प्रकार से योग्यता विद्यमान थी। काम करने की योग्यता श्री ब्रीलैण्ड में थी जिसके आधार पर उन्होंने महान् कार्य कर दिखाया।

अंत में ...
जीवन में अवसर एक बार अवश्य सब के दरवाज़े पर दस्तक देता है। हमें जरूरत है उसे पहचान कर पकड़ने की। हमें यह नहीं कहना चाहिए कि मैं यह कार्य नहीं कर सकता। हम कम से कम अपनी आँखों को खुला तो रख ही सकते हैं। चीज़ों को ध्यान से देखने और समझने की शक्ति तो पैदा कर ही सकते। जब यह शक्ति हमारे अंदर आ जाती है तो हम अपने आप समझ जाते है कि हम क्या कर सकते है और हमें अपने कार्य में सफलता अवश्य मिलती है।

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यह पोस्ट हमें मुकेश पंडित जी ने भेजी है, जो एक ब्लॉगर है। मुकेश जी 2015 से Motivational Stories in Hindi का संचालन कर रहे है। आपने आलेख तो पढ़ ही लिया होगा, उसी से आप अनुमान लगा सकते है कि आपको उनके ब्लॉग पर ढ़ेर सारी प्रेरक कहानियां और आलेख पढ़ने को मिलेंगे। मुकेश जी से ई-मेल panditmukesh2020@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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