27 March, 2017

वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है | मेरी आवाज


वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है
आँखों में नशेमन ढ़ो रहा है
किसी की याद में बस रो रहा है

आँचल माँ का फिर से पा गया है
कई दिन से मुसलसल सो रहा है

हमेशा ज़ुल्म से लड़ता रहा जो
वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है

बदलते दौर में इंसाँ की फितरत
मसल कर फूल काँटे बो रहा है

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आजम गढ़ के रहने वाले राजेश कुमार राय जी 2015 से ब्लॉगिग कर रहें है और शब्दों को कविताओं में पिरोकर पाठकों के लिए पेश कर रहें है।  ब्लॉगर से ई-मेल pratistharai32@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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