27 March, 2017

कश्तियाँ बचपन की है मझधार में... | सुनील मोगा


सोनू दरभंगा बिहार से अपने गाँव के ठेकेदार के साथ दिल्ली आया था। पांच भाई बहनों में सबसे बड़ा था लेकिन उम्र यही 14 वर्ष के करीब थी। बाप की मौत तो टीबी की बीमारी से हो गई। माँ के हाथ में कुछ काम नहीं था। दो भाई व दो बहनों का भार भी उसके कन्धों पर आ गया। स्कूल छोड़कर घर का मुखिया बन गया। मुखिया का बोझ उठाकर गाँव से दिल्ली की तंग गलियों में आ गया। बालश्रम के लिए कुख्यात दिल्ली के नबी करीम इलाके में बैग बनाने वाले कारखाने में काम करने लग गया। उसको यहाँ आये डेढ़ साल के करीब हो गए। रोज सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक काम करता। प्रत्येक बैग में चेन-जिप लगाने पर 3 रूपये मिलते। रोज दो सौ से लेकर तीन सौ रुपये कमा लेता था। सपना एक ही था घर को पालना। कमाई के हर नोट पर माँ की लाचारी व भाई-बहनों की उदासी ख़ामोशी के साथ अंकित करके जेब में रख लेता। हर बैग को तैयार करके जब वह साइड में रखता तो थोड़ी देर तक उसी को घूरकर देखता रहता। फिर एकदम झिझकर अगले बैग को तैयार करने में लग जाता। शायद उसको अपना स्कूल बैग याद आ जाता होगा और फिर अपने कंधों पर आये मुखिया के भार को याद करके अगले बैग को तैयार करने में लग जाता होगा क्योंकि हर बैग किसी न किसी सदस्य के सपनों की बुनियाद के लिए कीमत देता था।
परसों से सोनू मुरझाया-मुरझाया सा लग रहा था। जिंदगी की ठोकर ने शायद उनको दर्द छिपाने की कला सीखा दी थी, इसलिए चुपचाप काम में लग गया। लेकिन कच्ची कलियां बिना पोषण के कब तक धूप से अपना दामन बचाये रखेगी। दोपहर होते-होते बेहोश हो गया। साथी दो बच्चे उठाकर नजदीकी अस्पताल में ले गए। ठेकेदार ने 200 रूपए देकर भेज दिया था।

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पेशे से किसान राजस्थान के रहने वाले सुनील मोगा जी सन् 2013 से ब्लॉगिंग कर रहे है। इसके अलावा पत्रकारिता से भी जुड़े हुए है और अपने शौकिया लेखन को ब्लॉग के माध्यम से पाठको तक पहुंचा रहे है। ब्लॉगर से ई-मेल sunilbkn.meet@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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