13 April, 2017

हाशिए पर गंगा | मेरी आवाज


माँ,
मैं देख रहा हूँ
तुम्हारी पीड़ा, तुम्हारे कष्ट

मैं देख रहा हूँ,
कि कैसे तुम्हारे हृदय पे करती हैं चोट,
मथ देती हैं तुम्हारे पेट को
झकझोर देती हैं पूरी की पूरी शरीर
ये आधुनिक नावें,
काला कर चुकी हैं समूचे जल को अपने धुआँ से।

मैं देख रहा हूँ,
कि कैसे तुम्हारे नाम पे खेली जा रही है
ओछी-राजनीति,
खर्च किए जा रहे हैं हजारों करोड़ रूपये
पवित्रता, स्वच्छता और निर्मल बनाने का नाम दे-देकर।
क्या किसी ने कभी अपनी माँ से राजनीति खेली है क्या?



नीलेन्द्र शुक्ल 'नील' जून 2016 से ही ब्लॉग दुनिया में आए है। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक के छात्र है। आपसे sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


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