22 April, 2017

वसुन्धरा | ब्लॉग ऊंचाईयां


जिस धरती पर मैंने जन्म लिया
उस धरा पर मेरा छोटा सा घर
मेरे सपनों से बड़ा।।
बड़े -बड़े अविष्कारों की साक्षी वसुन्धरा
ओद्योगिक व्यवसायों से पनपती वसुन्धरा।

पुकार रही है वसुन्धरा
कराह रही है वसुन्धरा।

देखो तुमने ये मेरा क्या हाल किया
मेरा प्राकृतिक सौन्दर्य ही बिगाड़ दिया।

हवाओं में तुमने ज़हर भरा
में थर-थर कॉप रही हूँ वसुन्धरा
अपने ही विनाश को तुमने मेरे

दामन में फौलाद भरा
तू भूल गया है, ऐ मानव

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'ऊंचाईयां' ब्लॉग पर जाएं >>>



श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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