28 May, 2017

एक मिट्टी का बदन, चंद रिदाएँ होंगी | मेरी आवाज


ज़िस्म इंसान का है कुछ तो ख़ताएँ होंगी  
ज़िंदगी का है सफ़र कुछ तो बलाएँ होंगी

उसके लहज़े में महकती है वतन की खुशबू 
कुछ मिट्टी का असर, माँ की दुआएँ होंगी

एक तिनके को जलाने में जल गई बस्ती 
मेरा दावा है कि साज़िश में हवाएँ होंगी

हल्का हल्का ही सही कान में टकरातीं  हैं
खुश्क मौंसम में परिंदों की सदाएँ होंगी

एक पागल भी मोहब्बत में सोचता होगा 
मेरे महबूब के ज़ुल्फों में अदाएँ होंगी

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आजम गढ़ के रहने वाले राजेश कुमार राय जी 2015 से ब्लॉगिग कर रहें है और शब्दों को कविताओं में पिरोकर पाठकों के लिए पेश कर रहें है।  ब्लॉगर से ई-मेल pratistharai32@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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