02 May, 2017

बना सकती हो क्या | मेरी आवाज


मुझको अपना मेहमान बना सकती हो क्या?
मुझसे थोड़ी पहचान बना सकती हो क्या?

जिसको भगवान बनाओ उसको पूजो पर
मुझको भोला इन्सान बना सकती हो क्या?

मैं मन्दिर, मस्जिद गिरिजाघर को क्यों जाऊँ
खुद को मेरा भगवान बना सकती हो क्या?

मैं गिनता हूँ उन्मुक्त गगन में तारों को
मुझको तुम अपना चाँद बना सकती हो क्या?




नीलेन्द्र शुक्ल 'नील' जून 2016 से ही ब्लॉग दुनिया में आए है। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक के छात्र है। आपसे sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


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