14 May, 2017

मुर्दे | ब्लॉग एकलव्य


प्रस्तुत रचना "इरोम चानू शर्मिला" (जन्म : 14 मार्च 1972) को समर्पित है जो मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, जो पूर्वोत्तर राज्यों में लागू सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम, 1958 को हटाने के लिए लगभग 16 वर्षों तक (4 नवम्बर 2000 से 9 अगस्त 2016 ) भूख हड़ताल पर रहीं।

मैं हिला रहा हूँ
लाशें!
मैं जगा रहा हूँ
आसें!

उठ जा! मुर्दे
तूँ क़ब्र
तोड़ के
मैं बना रहा हूँ
खाँचें!

मैं हिला रहा हूँ
लाशें!
मैं जगा रहा हूँ
आसें!

मुर्दे तूँ
झाँक! क़ब्र से अपनी
जिसमें लिपटा
तूँ, आया था

नोंच रहें हैं
वे दानव
तूँ, जिन्हें
छोड़कर आया था

रक्त! जो पीछे
हैं तेरे,
तूँ जिन्हें भूलकर
आया था

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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