03 May, 2017

देख! वे आ रहें हैं | ब्लॉग एकलव्य


पाए हिलनें लगे!
सिंहासनों के,
गड़गड़ाहट हो रही
कदमों से तेरे,

देख! वे आ रहें हैं....

सौतन निद्रा जा रही
चक्षु से तेरे,
हृदय में सुगबुगाहट
हो रही,

देख! वे आ रहें हैं....

भृकुटि तनी है! तेरी
कुछ पक रहा,
आने से उनके
कुछ जल रहा
मनमाने से उनके,

देख! वे आ रहें हैं....

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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