02 May, 2017

थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है | मेरी आवाज


मायूसी है भारीपन है कुछ दर्द पिघलना  बाकी है
थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है

दुनियां की चालों में फंसकर कुछ तेवर मेरा बदला है
ऐ यार जरा ठोकर दे दे कुछ और सम्हलना बाकी है

दीपक की जलती लौ को तुम कुछ और बढ़ाकर तेज करो
जलने वाले परवानों का कुछ और मचलना बाकी है

ऐ इश्क़ बहुत उलझाया है थोड़ा और हमें उलझा देना
जीवन की बीच दोपहरी में थोड़ा और उलझना बाकी है

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आजम गढ़ के रहने वाले राजेश कुमार राय जी 2015 से ब्लॉगिग कर रहें है और शब्दों को कविताओं में पिरोकर पाठकों के लिए पेश कर रहें है।  ब्लॉगर से ई-मेल pratistharai32@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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