19 June, 2017

सुख-दुख | ब्लॉग नई सोच


दुख एक फर्ज है,
फर्ज तो है एहसान नहीं।
फर्ज है हमारे सर पर,
कोई भिक्षा या दान नहीं।

दुख सहना किस्मत के खातिर,
कुछ सुख आता पर दुख आना फिर।
दुख सहना किस्मत के खातिर...

दुख ही तो है सच्चा साथी
सुख तो अल्प समय को आता है।
मानव जब तन्हा  रहता है,
दुख ही तो साथ निभाता है।

फिर दुख से यूँ घबराना क्या?
सुख- दुख में भेद  बनाना क्या?

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