04 June, 2017

आशान्वित हुआ फिर गुलमोहर... | नई सोच


खडा था वह आँगन के पीछे
लम्बे, सतत प्रयास और  अथक,
इन्तजार के बाद आयी खुशियाँ...
शाखा-शाखा खिल उठी थी,
खूबसूरत फूलों से...
मंद हवा के झोकों के संग,
होले-होले...
जैसे पत्ती-पत्ती खुशियों का,
जश्न मनाती...
धीमी-धीमी हिलती-डुलती,
खिलते फूलो संग...
जैसे मधुर-मधुर सा गीत,
गुनगुनाती...
खुशियाँ ही खुशियाँ थी हर-पल,
दिन भी थे हसीन......
चाँदनी में झूमती, मुस्कुराती टहनी,
रातें भी थी रंगीन...
आते-जाते पंथी भी मुदित होते,
खूबसूरत फूलोंं पर...
कहते "वाह! खिलो तो ऐसे जैसे ,
खिला सामने गुलमोहर"...

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