26 June, 2017

मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा | ब्लॉग एकलव्य


अंगुलियाँ समेट के तू, मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा
हवाओं को लपेट के तू, आंधियाँ बना-बना
लहू की गर्मियों से तू, मशाल तो जला -जला
जला दे ग़म के शामियां, नई सुबह तो ला ज़रा

अंगुलियाँ समेट के तू, मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा

भूल जा तूँ जिंदगी, मौत को गले लगा
झूठ की जो लालसा, मन से तू निकाल दे
सपनों के पुलिंदों को, कदमों से ठोकर मार दे
क़िस्मत मिलेगी धूल में, माथे से लगा ज़रा

अंगुलियाँ समेट के तू, मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा

सोच मत तू है धरा, पंख तो फैला ज़रा
उड़ जा आसमान में, विश्वास से भरा-भरा
देख मत यूं  मुड़ के तू, लौटने के वास्ते

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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