19 June, 2017

तुम्हारे चेहरे पर | मेरी आवाज


रूपों का विस्तार तुम्हारे चेहरे पर
दिखता मा सा प्यार तुम्हारे चेहरे पर
कैसे खुद को रोक सकूँ ,मेरी दुनिया
लुट जाए सौ बार तुम्हारे चेहरे पर

छोटी बिंदिया माथे पर ऐसे सोहे
हों सोलह श्रृंगार तुम्हारे चेहरे पर

जब से होंठों ने होंठों को पाया है
तब से है त्यौहार तुम्हारे चेहरे पर

सच कहता हूँ वर्णन में ये छह ऋतुएँ
कम पड़ती सरकार तुम्हारे चेहरे पर



नीलेन्द्र शुक्ल 'नील' जून 2016 से ही ब्लॉग दुनिया में आए है। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक के छात्र है। आपसे sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


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