26 June, 2017

समय तू पंख लगा के उड़ जा | ब्लॉग नई सोच


माँँ! मुझे भी हॉस्टल में रहना है, मेरे बहुत से दोस्त हॉस्टल में रहते हैं, कितने मजे है उनके!...
हर पल दोस्तों का साथ... नहीं कोई डाँट-डपट... न ही कोई किचकिच....
मुझे भी जाना है हॉस्टल, शौर्य अपनी माँ से कहता.... 
माँ उसे समझाते हुए कहती "बेटा! जब बड़े हो जाओगे तब तुम्हे भी भेज देंगे हॉस्टल... 
फिर तुम भी खूब मजे कर लेना"...
समझते समझाते शौर्य कब बड़ा हो गया पता ही नहीं चला 
और आगे की पढ़ाई के लिए उसे भी हॉस्टल भेज दिया गया। 
बहुत अच्छा लगा शुरू-शुरू में शौर्य को हॉस्टल मेंं... 
परन्तु जल्दी ही उसे घर और बाहर का फर्क समझ में आने लगा...
अब वह घर जाने के लिए छुट्टियों का इन्तजार करता है,
और घर व अपनोंं की यादों में कुछ इस तरह गुनगुनाता है...

समय तू पंख लगा के उड़ जा...
उस पल को पास ले आ...
जब मैंं मिल पाऊँ माँ -पापा से,
माँ-पापा मिल पायें मुझसे
वह घड़ी निकट ले आ...
समय तू पंख लगा के उड़ जा।

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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