04 July, 2017

अहंकार | नई सोच


मानसूनी मौसम में बारिश के चलते,
सूखी सी नदी में उफान आ गया...
देख पानी से भरा विस्तृत रूप अपना,
इतराने लगी नदी, अहंकार छा गया...
बहाती अपने संग कंकड़-पत्थर,
फैलती काट साहिल को अपने....

हुई गर्व से उन्मत इतनी,
पास बने कुएं से उलझी.......
बोली कुआं! देखो तो मुझको,
देखो! मेरी गहराई चौड़ाई,
तुम तो ठहरे सिर्फ कूप ही,
मैं नदी कितनी भर आयी!...

शक्ति मुझमें इतनी कि सबको बहा दूँ ,
चाहूँ गर तो तुमको भी खुद में समा दूँ....
मैं उफनती नदी हूँ.! देखो जरा मुझको,
देखो! बढ रही कैसे मेरी गहराई चौड़ाई...

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