01 July, 2017

ख़ाली माटी की जमीं | ब्लॉग एकलव्य


 बदलते समाज में रिश्तों का मूल्य गिरता चला जा रहा है। बूढ़े माता-पिता बच्चों को बोझ  प्रतीत होने लगे हैं और हो भी क्यूँ न? उनके किसी काम के जो नहीं रह गए! हास् होती सम्बन्धों में संवेदनायें, धन्यवाद।
'एकलव्य'
बचपन था मेरा नासमझ
ले आया बद की रौशनी
एक ओर करता ग़म अंधेरा
उस ओर ख़ुश है रौशनी 

पाने को एक छोटी ख़ुशी
एक दौड़ लगती है कहीं
कुचले गये अरमान सारे
इस होड़ के रौ में वहीं 

चित्कारता मन भी कहे
कब ख़तम ? ये खेल भी
जारी रहा बरसों तलक
बस करो! अब अंत भी

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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