27 July, 2017

टुकड़ा-टुकड़ा भूख | ब्लॉग बोल सखी रे


वो कुल्हाड़ी से वार करता जा रहा था। उसे न कुछ सुनाई पड़ रहा था, न दिखाई पड़ रहा था। जब कुल्हाड़ी उसके हाँथ से दूर जा गिरी वह धम से वहीं जमीन पर गिर पड़ा। तब तक घर के आस पास भीड़ लग गई थी। लोग घर के अंदर घुसे तो देखा वह अचेत पड़ा है। उसकी पत्नी की छिन्न-भिन्न लाश पड़ी है। घर में चारों तरफ़ खून ही खून।
भीड़ में लोग क्या हुआ! क्या हुआ! कर रहे थे। कोई बोला अरे अंतू ने अपनी पत्नी को कुल्हाड़ी से काट डाला। तब तक पुलिस आ गयी। भीड़ तितर-हो गई थी। पुलिस ने घर अपने कब्जे में कर लिया था। लोग अब भी दूर दूर से देख रहे थे। पुलिस ने शव को पंचनामा के लिए भेज दिया था और अंतू को थाने ले गयी।
अंतू चुप था जैसे वो कभी बोला ही न हो। वह रात भर वैसे ही बैठा रहा। बिना हिले-डुले। सुबह पुलिस को जो उसने बताया वह क्या यकीन करने लायक था।
वो भूख से बेहाल था। घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था। पत्नी घर में नहीं थी। जब तक पत्नी घर लौटती उसने पूरा घर छान लिया। कुछ भी नहीं मिला जो उसकी भूख को शांत कर सकता।
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पिछले एक हफ्ते से उसे काम नहीं मिल रहा था। शहर में कर्फ्यू के हालत थे। अफवाहों ने शहर के लोगों को दहशत में दाल दिया था। हर व्यक्ति को शक की नजर से देखा जा रहा था। कहीं बच्चा चोर तो कहीं मोबाइल चोर। वो अपनी ईमानदारी का क्या सबूत देता। अच्छे कपडे थे नहीं। काला कमजोर शरीर, तन पर चार पांच साल पुराने पैबंद  लगे कपडे, हिंदी भी ठीक से नहीं बोल पाता।
मजदूर चौक पर सन्नाटा छाया हुआ था। क्या पूरे शहर में काम ख़त्म हो गया था या उन जैसे लोगों को काम नहीं दिया जा रहा था।
घर में सब सामान खत्म हो गया था। पत्नी कुछ लाने के लिए बोलती तो वह घर से निकल जाता। न घर में रहेगा न पत्नी कुछ लाने के लिए बोलेगी। तीन दिन से अंतू घर नहीं जा रहा था। दारू की भट्ठी पर पड़ा रहता। भट्ठी वाले का कुछ कुछ काम कर देता। बदले में वह उसे थोड़ी सी दारु पिला देता। एक दिन भट्ठी वाले ने उससे कहा कि अंतू अपनी पत्नी को भी यहां ले आ। भट्ठी पर बैठेगी तो आमदनी बढ़ जाएगी। तुझे महीना-महीना पगार दे दिया करूंगा और दारु फ्री, चाहे जितनी पी।

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अपर्णा बाजपेयी जी सन 2016 से ब्लॉग लिख रहीं है। अपर्णा जी अपने ब्लॉग पर कविताएं और कहानियां व प्रेरक कोट्स लिखती है। अधिक जानकारी के लिए उनके ब्लॉग को विजिट करें। 


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