13 July, 2017

कहीं मेरे कफ़न की चमक | ब्लॉग एकलव्य


कुछ जलाये गए, कुछ बुझाये गए
कुछ काटे गए, कुछ दफ़नाये गए
मुझको मुक़्क़म्मल जमीं न मिली
मेरे अधूरे से नाम मिटाए गए 

एक वक़्त था! मेरा नाम शुमार हुआ करता था

चंद घड़ी के लिये ही सही, ख़ास-ओ-आम हुआ करता था
रातों -दिन महफ़ील जमती थी, मेरे महलों की चौखट पर
चारों पहर जलसे होते थे, मेरी नुमाइंदगी में
करते थे लोग सज़दे मेरी सादग़ी में

एक वक़्त आज है! अकेला क़ब्रिस्तान में पड़ा-पड़ा
ना जाने किसका इंतज़ार करता रहता हूँ

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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