31 August, 2017

कृषक अन्नदाता है | ब्लॉग नई सोच


आज पुरानी डायरी हाथ लग गयी, टटोलकर देखा तो यह रचना आज के हालात पर खरी उतरती हुई दिखी, आज किसानों की स्थिति चिन्ताजनक है। मुझे अब याद नहीं कि तब करीब 30 वर्ष पहले किन परिस्थितियों से प्रभावित होकर मैंने यह रचना लिखी होगी? कृषकोंं की चिन्ताजनक स्थिति या फिर लोगों में बढ़ती धनलोलुपता...?
तब परिस्थितियाँ जो भी रही हो। अपने विद्यार्थी जीवन के समय की रचना आप लोगों के साथ साझा कर रही हूँ। आप सभी की प्रतिक्रिया के इंतज़ार में "मेरे छुटपन की कविता"

कागज का छोटा सा टुकड़ा (रुपया)
पागल बना देता है जन को
खेती करना छोड़कर
डाकू बना रहा है मन को...।

इसके लिए ही भाग रहे
श्रमिक मजदूर सिपाही...
इसी के लिए दौड़-भागकर
देते हैं सब सुख - चैन को भी तबाही...

हे देश के नवजवानोंं!
सुनो प्रकृति का़ संदेश...
इसके पीछे मत भागो,
यह चंचल अवशेष...

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें >>>


सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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