05 August, 2017

कुदरत की मार | ब्लॉग नई सोच


देखो! अब का मनभावन सावन,
कैसे अस्त-व्यस्त है जीवन!
कहीं पड़ रही उमस भरी गर्मी,
कहींं मौसम की ज्यादा ही नर्मी...

कहीं भरा है पानी-पानी,
कहीं बाढ़ देख हुई हैरानी!
कहीं घर में भर आया पानी,
घर छोड़ी फिर मुनिया रानी...

भीगी सारी किताबें उसकी,
भीग गया जब बस्ता...
कैम्पस में दिन काट रहे,
खाने को मिले न खस्ता...

घर पर बछिया छोटी सी
बाँधी थी वह खूँटी से...
वहीं बंधी गौरा (गाय) प्यारी...
दूध निकाले थी महतारी

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सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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