23 September, 2017

अमृत और विष | ब्लॉग ऊचाईयाँ


जहर उगलने वाला नहीं, ज़हर पीने वाला हमेशा महान होता है।
बनना है तो उस कड़वी दवा की तरह बनिये जो शरीर में होने वाले रोगों रुपी ज़हर को नष्ट करती है, ना कि उस ज़हर की तरह जो विष बनकर किसी को भी हानि ही पहुंचता रहता है।
शब्दों का उपयोग बड़े सोच समझ कर करना चाहिये।
कुछ लोग कहते हैं, हम तो दिल के साफ हैं, जो भी कहते हैं,
साफ-साफ कह देते हैं ,हम दिल में कुछ नहीं रखते।
अच्छी बात है, आप सब कुछ साफ-साफ बोलते हैं, दिल में कुछ नहीं रखते।
दूसरी तरफ आपने ये भी सुना होगा कि, शब्दों का उपयोग सोच-समझ कर करिये। "मुँह से निकले हुए शब्द "और "कमान से निकले हुए तीर"वापिस नहीं जाते ,कमान से निकला हुआ तीर जहाँ पर जा कर लगता है, अपना घाव कर जाता है, अपने निशान छोड़ ही जाता है, माना कि घाव ठीक हो ही जाता है, परंतु कड़वे शब्दों के घाव जीवन भर दिलों दिमाग पर शूल बनकर चुभते रहते हैं।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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