14 September, 2017

जाने कब खत्म होगा, ये इंतज़ार... | ब्लॉग नई सोच


ये अमावस की अंधेरी रात
तिस पर अनवरत बरसती
ये मुई बरसात..
और टपक रही मेरी झोपड़ी
की घास-फूस...
भीगती सिकुड़ती मिट्टी की दीवारें 
जाने कब खत्म होगा  ये इन्तजार?
कब होगी सुबह...?
और मिट जायेगा ये घना अंधकार!
थम ही जायेगी किसी पल फिर यह बरसात

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें >>>


सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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