05 September, 2017

आओ बुढ़ापा जिएं | ब्लॉग नई सोच


वृद्धावस्था अभिशाप नहीं.... यदि आर्थिक सक्षमता है तो मानसिक कमजोरी शोभा नहीं देती ..... सहानुभूति और दया का पात्र न बनकर, मनोबल रखते हुए आत्मविश्वास के साथ वृद्धावस्था को भी जिन्दादिली से जीने की कोशिश जो करते हैंं, वे वृृद्ध अनुकरणीय बन जाते है...।

जी लिया बचपन, जी ली जवानी...
आओ बुढापा जिएं।
यही तो समय है, स्वयं को निखारें...
जानेंं कि हम कौन हैं .......?

तब नाम पहचान था.....
फिर हुआ काम पहचान अपनी
आगे रिश्तों से जाने गये.....
सांसारिकता में स्वयं खो गये।

शरीर तो है साधन जीवन सफर का
ये पहचान किरदार हैं.....
कहाँ से हैं आये ? कहाँँ हमको जाना.....?
अपना सफर है जुदा......
यही तो समय है स्वयं को पहचाने
जाने कि हम कौन हैं ...?

क्या याद बचपन को करना ,
क्या फिर जवानी पे मरना ,
यही मोह माया रहेगी.....
फिर - फिर ये काया मिलेगी ....
भवसागर की लहरों में आकर

क्या डूबना क्या उतरना...?
हाँ क्या डूबना... क्या उतरना... 
जरा ध्यान प्रभु का करें हम,
तनिक ज्ञान खुद को भी दें अब.....
यही तो समय है, स्वयं को निखारें 
जाने कि हम कौन हैं...?

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें >>>


सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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