10 September, 2017

स्त्री या सुनामी | ‍ब्लॉग @अभि


सुनो, तुम दिन भर खटती रहती हो
घुँघरू की ताल पर नाचती हुई
सबके लिए फिक्रमंद
जरूरतों के मुताबिक
थोड़ा-थोड़ा जीती हो,
कभी घर के हिसाब में,
कभी बच्चों की तकरार में,
कभी माँ-बाबूजी की अवस्था 
को समझने में
खुद भी उलझ जाती हो,
घर के राशन से दवाई तक
रिश्ते-नातों से लेकर
बच्चों की पढ़ाई तक,
समाज, घराना, मित्र व्यवहार
सबमें इतनी सजग
जैसे समर्पण की देवी हो,
सबको अपना बना लेती हो,
हथेलियों से छांव करने को आतुर,
बस नेह के लिए बनी हो,
चेहरे पर बसी पुरकशिश मुस्कान
सारे रहस्य छुपा लेती है,
कभी तो थकती होगी,
कुछ तो दुखता होगा,

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए '@अभि' ब्लॉग पर जाएं >>>



लखनऊ निवासी अभि अभिलाषा जी ने सन 2017 से ही ब्लॉग लिखना शुरू किया है और तब से लेकर अब तक 100 से ऊपर रचनाएं लिख चुकीं है। उनसे ई-मेल abhi.abhilasha86@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। 


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