06 September, 2017

इमदाद मुझे ईमानों की कुछ और जरा दे दे साक़ी | ब्लॉग मेरी आवाज


सौ दर्द भरे अफसानों में इक मेरा भी अफसाना है
इक तेरे तबस्सुम की ख़ातिर मुझे गीत वफा के गाना है

कुछ कर्म हमारे हाथों में कुछ है तेरी मंजूरी भी 
दस्तूर यही इस दुनियां का कुछ खोना है कुछ पाना है

तू ही तो सब कुछ है पर तसक़ीम समझना है मुश्किल 
कुछ को मिला सिफर हाथों में कुछ को मिला ख़जाना है

इमदाद मुझे ईमानों की कुछ और जरा दे दे साक़ी 
मैं रिन्द हुँ तेरी आंखों का उस पार मुझे भी जाना है

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'मेरी आवाज' ब्लॉग पर जाएं >>>



आजम गढ़ के रहने वाले राजेश कुमार राय जी 2015 से ब्लॉगिग कर रहें है और शब्दों को कविताओं में पिरोकर पाठकों के लिए पेश कर रहें है।  ब्लॉगर से ई-मेल pratistharai32@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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