27 September, 2017

और वे जी उठे | ब्लॉग एकलव्य


"और वे जी उठे" !

मैं 'निराला' नहीं
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ
'दुष्यंत' की लेखनी का
गुरूर ज़रूर हूँ

'मुंशी' जी गायेंगे मेरे शब्दों में
कुछ दर्द सुनायेंगे
सवा शेर गेहूँ के
एक बार मरूँगा पुनः
साहूकार के खातों में
भूखा नाचूँगा नंगे
तेरे दरवाज़ों पे
अपनी ही लेखनी का
एक फ़ितूर ज़रूर हूँ  

मैं 'निराला' नहीं
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ
'दुष्यंत' की लेखनी का
गुरूर ज़रूर हूँ

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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