05 September, 2017

जिओ और जीने दो | ब्लॉग हिन्दी-आभा*भारत


ख़ुद जिओ 
अपने जियें,
और 
काल-कवलित 
हो जायें। 

कितना नाज़ां / स्वार्थी
और वहशी है तू,
तेरे रिश्ते 
रिश्ते हैं 
औरों के फ़ालतू।

चलो अब फिर 
समझदार,
नेक हो जायें,
अपनी ज़ात 
फ़ना होने तक
क्यों  बौड़म  हो जायें...?


क़ुदरत  की 
करिश्माई कृति = इंसान 
सृजन को 
विनाश के 
मुहाने पर 
लाने वाला =इंसान।

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'हिन्दी-आभा*भारत' ब्लॉग पर जाएं >>>



रविन्द्र सिंह यादव जी का परिचय उन्ही के शब्दों में : कविता, कहानी और लेख लिखते-लिखते समझ विकसित हुई तो पाया जीवनचर्या के लिए केवल लेखन कार्य पर निर्भर रहना नादानी है। वर्तमान में मेडिकल लैब टेक्नोलॉजिस्ट के तौर पर नई दिल्ली में निजी संस्थान में कार्यरत। इटावा उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल (महाराजपुरा, तहसील चकरनगर) में 14 जनवरी 1968 जन्म। म. प्र. के कई ज़िलों में रहकर शिक्षा प्राप्ति। आकाशवाणी ग्वालियर म.प्र. से 1992-2003 के बीच कविता, कहानी, वार्ता, विशेष कार्यक्रम आदि का नियमित प्रसारण। ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले विभिन्न दैनिक समाचार-पत्रों में लेख व कविताओं का प्रकाशन।


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