04 September, 2017

सेल्फी में चमकता देश | ब्लॉग बोल सखी रे


मेरे चहरे पर ये जो उदासी देख रहे हो
मेरी ही पीड़ा नहीं है इसमे
मेरी आँखों में थोड़े से आंसू सीरिया के उन बच्चों के भी है;
जिन्होंने पैदा होने  के बाद सिर्फ बारूद का धुंआ देखा है,

मेरी उफ़्फ़ में उन लाखों औरतों का दर्द है
जो अनचाहे ही बिस्तरों पर पटक दी जाती हैं,

मेरी सूजी हुई आँखें कहानी कहती हैं उस बेनींद बुढ़ापे की
जो दरवाजे पर टकटकी लगाए अंतिम  साँसे गिन रहा है.

तुम कहते हो तुम्हे मेरे चेहरे पर प्यार नज़र नहीं आता;
हाँ, उसे मैंने तितलियों के परों में छुपा दिया है;

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अपर्णा बजपेयी जी जम्शेद्पुर में रहती है। आपने 2016 में ही ब्लॉग लेखन शुरू किया है और वर्तमान में झारखंड में आदिवासियों के बीच स्वास्थ, शिक्षा, आजीविका के मुद्दे पर काम कर रहीं है। दैनिक हिन्दुस्तान, जन संदेश टाइम्स, कथाक्रम तथा अन्य कई पत्र पत्रिकाओं में आपकी कविता और कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं।


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