07 September, 2017

तुम मेरा मधुमास बन कर लौट आओ | ब्लॉग बोल सखी रे


लौट कर आओ ज़रा सा मुस्कुराओ
चाँद- तारों को हंथेली में छुपाओ
और कह दो रात ये सूनी न होगी
उन नयन में दीप्ति मेरी गुनगुनाओ
तुम मेरा मधुमास बन कर लौट आओ।

मै अकेला ही रुका था बाँध पर जब
तुम नदी सी बह चली थी भोर के संग
साथ मेरे थम गया था द्वेष सारा
तुम हवा सी उड़ चली थी रीत पर सब।

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अपर्णा बजपेयी जी जम्शेद्पुर में रहती है। आपने 2016 में ही ब्लॉग लेखन शुरू किया है और वर्तमान में झारखंड में आदिवासियों के बीच स्वास्थ, शिक्षा, आजीविका के मुद्दे पर काम कर रहीं है। दैनिक हिन्दुस्तान, जन संदेश टाइम्स, कथाक्रम तथा अन्य कई पत्र पत्रिकाओं में आपकी कविता और कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं।


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