12 September, 2017

तू चली आ, तू चली आ, तू चली आ अब यहाँ | ब्लॉग मेरी आवाज


मैं अधूरे ख़्वाब लेकर के बता जाऊँ कहाँ
तू चली आ, तू चली आ, तू चली आ अब यहाँ-2

तू चला आ, तू चला आ , तू चला आ अब यहाँ-2

मैं कहूँ कैसे तुम्हारी आरज़ू हमको नही
चाहता हूँ मैं तुम्हें तुमसे बग़ावत है नही
किस कदर तुमसे कहूँ अपने दिलों की दास्ताँ।। तू चली आ...

छुप-छुपा कर देखता तुझको शज़र की छाँव में
डूब जाता हूँ मैं अक्सर उस शहर, उस गाँव में
हैं तेरी यादें यहाँ करती मेरे मौसम जवाँ।। तू चली आ...

आज हो जैसे युँ ही रहना सदा तुम उम्रभर
ज़िन्दगी आसान होगी कट सकेगा ये सफर
साथ ग़र देती रही बनता रहेगा आशियाँ।। तू चली आ...



नीलेन्द्र शुक्ल 'नील' जून 2016 से ही ब्लॉग दुनिया में आए है। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक के छात्र है। आपसे sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


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