17 October, 2017

खूँटी पर बँधी है रस्सी | ब्लॉग ऊंचाईयाँ


खूँटी पर बँधी है रस्सी
एक डोर भवसागर की ओर
दूजी डोर धर्मराज की हाथ ।

धरती पर आया है,
मुसाफ़िर बन कर
तू यूँ डाले है, धरती
पर डेरा, जैसे की वापिसी
का टिकट ही न हो तेरा
हर एक का है, वापिसी का टिकट

जीवन की डोर पहुँच रही है, ना जाने
किस-किस की धर्मराज के, ओर
मौत की खूँटी पर लटकी है, गर्दन
पैर लटक रहे हैं कब्र पर
उस पर असीमित जिज्ञासाओं का मेला
दुनियाँ का मेला, मेले में हर शख्स अकेला

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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