28 October, 2017

मेरा मज़हब मोहब्बत | ब्लॉग ऊंचाईयाँ


*क्या करूँ ,मेरा तो मज़हब ही मोहब्बत है
मोहब्बत के सिवा मुझे कुछ समझ ही न आये *
तो मैं क्या करूं ?

"हम तो मोहब्बतें चिराग जलाये बैठे रहेगें
चिरागों से नफरतों के अँधेरे दूर होते रहेंगे
चिराग तो जलते ही हैं ,जहाँ को रोशन करने के लिये
अब कोई अपना मन जलाये तो हम क्या करें
किसी को समझ ना आये तो हम क्या करें"

मोहब्बत की आग तो चिराग़े दिलों में ही
जला करती है, यूँ तो *ये*मोहब्बत की आग दिलों को
ठंडक देती है , पर कभी-कभी दिलों को जला
भी देती है।

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श्रीमती रितु आसूजा जी सन 2013 से ब्लॉग लिख रहीं है और तब से लेकर अब तक प्रेरक और समाजिक लेखन के जरिए ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। उनसे ई-मेल ritu.asooja1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। रितु जी काे फेसबुक पर फालों करने के लिए यहां क्लिक करें।


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