05 October, 2017

तब सोई थी जनता, स्वीकार गुलामी थी | ब्लॉग नई सोच


सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी...
रो-रो कर सहती प्रताड़ना को
नियति मानती थी...
जैसे कीलों के आसन पर,
कोई कुत्ता पल पल रोता...
जब चुभती कीलें उठ जाता
फिर थककर सोता......
फिर बैठ वहीं, दुखकर
बस थोड़ा उठ जाता....
पर कभी ना कोशिश करता
आसन से बाहर आने की,
अपने भारत की भी कुछ,ऐसे ही कहानी थी...
तब सोई थी जनता, स्वीकार गुलामी थी...
गर रोष में आकर कोई 
आवाज उठा देता...
दुश्मन से फिर अपना
सर्वस्व लुटा देता...
इस डर से चुप सहना ही सबने ठानी थी...
तब सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी...
बड़ी कोशिश से बापू ने
सोयों को जगाया था...
आजादी का सपना

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें >>>


सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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