01 October, 2017

सेनेटरी नेपकिन: संकोच छोड़ बात करना जरुरी हैं | ब्लॉग आपकी सहेली


सॉरी...दोस्तों, आज मैं एक ऐसे विषय के बारे में बात कर रहीं हूं जिस बारे में बात करने में भी एक प्रकार का संकोच महसूस होता हैं क्योंकि सेनेटरी नेपकिन पर बात करना समाज में आज भी प्रतिबंधित सा हैं। लेकिन सेनेटरी नेपकिन का संबंध करोड़ों महिलाओं के स्वास्थ से जुड़ा होने से बात करना बहुत ही ज़रुरी हैं। एक बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई हैं कि माहवारी आना यह एक नैसर्गिक प्रक्रिया हैं और ये हर लड़की/महिला के साथ होता हैं। फ़िर इतनी प्राकृतिक एवं सरल बात को हमारे समाज में इतना अप्राकृतिक और असहज क्यों बनाया जाता हैं? क्यों आज भी महिलाओं को सेनेटरी पैड खरीदते वक्त एक प्रकार का संकोच होता हैं? क्यों दुकानदार पैड को अखबार में या काली पॉलिथिन में लपेटकर देते हैं?

महिलाओं के लिए कितना ज़रुरी हैं सेनेटरी नेपकिन?

घर के कामों को करते वक्त कभी-कभी यदि दो-चार घंटे लगातार हाथ गिले रह जाते हैं तो उंगलियों में सनसनाहट होने लगती हैं। क्या कभी हमने सोचा हैं कि उन महिलाओं पर क्या बितती होगी जिनके गुप्तांग घंटों गंदगी में रहते हैं? यह एक भयानक सत्य हैं कि नारी को माँ बनने का सुख देने वाली इस प्रक्रिया से जूझने के लिए नारी को बहुत भारी किंमत चुकानी पड़ती हैं।
• रिपोर्टों के मुताबिक, भारत में 33 प्रतिशत लड़कियाँ माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जाती हैं क्योंकि स्कूलों में उनके लिए अलग से शौचालय और पैड निस्तारण की समुचित व्यवस्था नहीं रहती हैं। इस वजह से उनकी एक वर्ष में एक महीने से ज्यादा दिनों की पढ़ाई प्रभावित होती हैं।
• विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार गर्भाशय के मुंह के कैंसर के कुल मामलों में से 27 फ़ीसदी भारत में होते हैं। और डॉक्टरों के अनुसार इसकी बड़ी वजह माहवारी के दौरान साफ़-सफ़ाई की कमी हैं!

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ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


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