11 November, 2017

आरक्षण और बेरोजगारी | ब्लॉग नई सोच


जब निकले थे घर से, अथक परिश्रम करने,
नाम रौशन कर जायेंगे,ऐसे थे अपने सपने....
ऊँची थी आकांक्षाएं, कमी न थी उद्यम में,
बुलंद थे हौसले भी तब, जोश भी था तब मन में!!
नहीं डरते थे बाधाओं से, चाहे तूफ़ान हो राहों में!
सुनामी की लहरों को भी, हम भर सकते थे बाहों में


शिक्षित बन डिग्री लेकर ही, हम आगे बढ़ते जायेंगे।
सुशिक्षित भारत के सपने को, पूरा करके दिखलायेंगे।।
महंगी जब लगी पढ़ाई, हमने मजदूरी भी की ।
काम दिन-भर करते थे, रात पढ़ने में गुजरी।।
शिक्षा पूरी करके हम, बन गये डिग्रीधारी।
फूटी किस्मत के थे हम, झेलें अब बेरोजगारी।।


शायद अब चेहरे से ही, हम पढ़े-लिखे दिखते हैं!
तभी तो हमको मालिक, काम देने में झिझकते हैं....
कहते; "दिखते हो पढ़े-लिखे, कोई अच्छा सा काम करो !
ऊँचे पद को सम्भालो, देश का ऊँचा नाम करो"!!!

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ब्लॉग 'नई सोच' पर जाएं >>>


सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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