01 November, 2017

भूख का इंकलाब | ब्लॉग बोल सखी रे


जब तुम दलीलें दे रहे थे 
भूख से नहीं मर रहे बच्चे, 
रिक्शा चालाक और मजदूर,
तब सड़क पर खड़े एक भिखमंगे ने
फेंक दिया था खोलकर 
अपने शरीर पर बचा 
एक मात्र अधोवस्त्र,
खड़ा हो गया था नंगा 
शासन के ख़िलाफ़!
कि नंगे का सामना 
नंगा ही कर सकता है,
भूख भूखे को ही जिबह करती है,
लील लेती है बेरोजगारी 
मासूम युवा को 
फंदे की शक्ल में.
भूख से आदमी नहीं मरता;
मरती हैं अंतड़ियां

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अपर्णा बजपेयी जी जम्शेद्पुर में रहती है। आपने 2016 में ही ब्लॉग लेखन शुरू किया है और वर्तमान में झारखंड में आदिवासियों के बीच स्वास्थ, शिक्षा, आजीविका के मुद्दे पर काम कर रहीं है। दैनिक हिन्दुस्तान, जन संदेश टाइम्स, कथाक्रम तथा अन्य कई पत्र पत्रिकाओं में आपकी कविता और कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं।


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