01 November, 2017

...और शर्म भी शर्म से पानी-पानी हो गई | ब्लॉग अापकी सहेली


आज किसी भी दुर्घटना पर ज्यादातर लोगों की मानसिकता ‘मुझे क्या करना हैं?’ ‘मेरे पास वक्त नहीं हैं...नहीं तो मैं ज़रुर मदद करता/करती’ ऐसी हो गई हैं। संवेदनाएं तो जैसे खत्म ही हो गई हैं। ठीक हैं भई...कौन पुलिस के चक्कर में पड़े! लेकिन हमारी यह कौन सी मानसिकता हैं कि गंभीर और इंसानियत को शर्मसार करती दुर्घटनाओं पर भी हम पीड़ित व्यक्ति की मदद करने के बजाय घटना की फ़ोटो लेने लगते हैं या वीडियो बनाने लगते हैं? क्या हैं ज्यादा ज़रुरी...पीड़ित की मदद करना या अपने सोशल अकाउंट पर दुर्घटना की फ़ोटो या विडियो शेयर करना?
23 अक्तूबर, 2017 को आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम की भीड़ भरी एक सड़क पर एक नशेड़ी रेलवे स्टेशन के पास फुटपाथ पर दिनदहाडे दोपहर 2 बजे 28 साल की महिला से रेप करता रहा और लोग बगल से गुजरते रहे! इस घ्रूणित वाकये को लोग तमाशबीन होकर देखते रहे! किसी ने भी महिला को नहीं बचाया। वहां पर दो-तीन लोग ‘लाइव रेप’ की तस्वीरे ले रहे थे, दो-तीन लोग वीडियो बना रहे थे और कुछ तमाशबीन बन कर चिल्ला रहे थे!! क्या ये सब लोग मिल कर उस रेप पीड़ित महिला की सरेआम लुटती इज़्ज़त बचा नहीं सकते थे? क्या हो गया हैं हमें? हम इतने ज्यादा संवेदनाहीन कैसे हो गए? यदि वो महिला हमारी अपनी माँ, बहन या बेटी होती तो?

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ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


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