13 November, 2017

लघु कथा.. गेट-टुगेदर | ब्लॉग अभिव्यक्ति


माँ ..माँ, बड़े भैया का फोन था, कह रहे थे इस दिवाली सब एक गेट टुगेदर रखते हैं ....बोलते हुए राघव ने कमरे में प्रवेश किया। अच्छा, सुधा की आँखे खुशी से छलछला उठी बोली, अच्छा कब आ रहे हैं सब ?
नहीं माँ, भैया कह रहे थे कि हम तीनों भाई और दीदी सब मिलकर कहीं एक जगह जाएंगे दो -तीन दिन के लिए ..घूमना भी हो जाएगा और गेट टुगेदर भी।
अरे तो वो सब यहाँ अपने, खुद के घर भी तो आ सकते हैं न, क्यों पहले भी तो हम सब साथ रहते थे न इसी घर में कितनी धमाचौकड़ी मचाते थे तुम लोग दिन भर और नीला, तेरी दीदी वो तो बात-बात में रूठ जाती थी और फिर तुम सब मिलकर उसे कैसे मनाते थे।
नहीं माँ, भैया कह रहे थे कि किसी रिसोर्ट में चलेंगे।
यहाँ कहाँ इतनी जगह है ...भाभियाँ, बच्चे सभी तो होंगे ...आजकल तो सभी को अलग कमरे चाहिए होते हैं न..
सुधा बोली, ठीक है, जैसा तुम लोगों को अच्छा लगे..
और फिर रोज फोन पर राघव अपने भाइयों के साथ इस गेट टुगेदर के बारे में बात करता, वार्तालाप के कुछ अंश उसे भी सुनाता। जाने का दिन व समय तय हो गया, एक अच्छे से रिसोर्ट में सबके अलग-अलग कमरे बुक हो गए। राघव ने उसे बताया ..माँ तुम्हारे लिए भी अलग कमरा बुक करवाया है भैया ने। दो दिन सब साथ रहेगें, कितना मजा आएगा न, राघव नें कहा।
राघव उसका सबसे छोटा बेटा, अभी पढाई कर रहा है, वो और राघव अभी यहीं अपने घर में रहते है। बच्चों के पिताजी तीन साल पहले ही हम सबको अलविदा कह गये। दोनों बडे बेटे अपने अपने परिवार को लेकर दूसरे शहरों म़े रहते है। बेटी अपने ससुराल म़े सुखी है, ओर क्या चाहिए उसे।



शुभा मेहता सितम्बर 2013 से ब्लॉगिंग कर रही है और बचपन से ही पढ़ने की शौकीन है। उनके प्रोफाइल के अनुसार शुभा जी कहती है कि मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ।


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