29 December, 2017

अब लौट आओ प्रियवर | ब्लॉग मेरी जुबानी


अब लौट आओ प्रियवर.....
अकुलाता है मेरा उर अंतर..
शून्यता सी छाई है रिक्त हुआ अंतस्थल.
पल पल युगों समान भए
दीदार को नैना तरस गए
इंतजार में तुम्हारे पलके बिछी हैं
तुम बिन बिखरा बिखरा सा मेरा संसार है प्रियवर
अब लौट आओ प्रियवर

अब लौट आओ प्रियवर
कि थम जाती है मेरी हर सोच
तुम पर आकर
रुक जाता है वक़्त तुम्हें न पाकर
पांव आगे ही नहीं बढ़ते
वो भी ढूँढते हैं तुम्हें
रातें करवटों में तमाम हो जाती है
तुम बिन बेकार ये संसार है प्रियवर
अब लौट आओ प्रियवर

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'मेरी जुबानी' ब्लॉग पर जाएं >>>



सुधा सिंह जी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हुई है। सन‍् 2015 से ब्लॉग लेखन कर रहीं है और अब तक कई मुद्दो पर लेख चुकी है। आप कविताओं के माध्यम से अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकट करती है। 


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