11 December, 2017

अस्पतालों में बच्चों की मौत के लिए कौन हैं जिम्मेदार | ब्लॉग आपकी सहेली


इन ख़बरों पर गौर कीजिए...

• दिल्ली के शालिमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल ने जीवित बच्चे को मृत बताया!
• गोरखपुर के BRD अस्पताल में 36 बच्चों की मौत!
• फर्रुखाबाद में 49 बच्चों की मौत!!
• झारखंड के दो बड़े अस्पतालों में पिछले पांंच महीनों के अंदर 300 बच्चों की मौत!!!

ऐसी दिल दहलाने वाली और दिमाग को झंझोड़ने वाली ख़बरे पढ़ कर और देख-सुन कर भी हम सब इतने शांत कैसे और क्यों है, यहीं बात मेरी समझ में नहीं आ रही हैं...!! जैसे इन बच्चों की मौतें; मौतें न होकर मिट्टी के खिलौने टूट रहे हो...अरे भई, खिलौने भी टुटते हैं तो दिल में दर्द होता हैं...ये तो जीते-जागते बच्चे थे! किसी माँ-बाप के जीगर के टुकड़े...कितनी नाजों से पाला होगा उनके माँ-बाप ने उन्हें...उनकी मौत पर कितने खून के आँसू रोएं होंगे वे...!! सचमुच कभी-कभी लगता हैं कि कितने संवेदनाहीन हो गए है हम। यदि ये घटना हमारे अपने बच्चे के साथ होती या किसी बड़े नेता के बच्चे के साथ होती तब शायद हमारे या बड़े-बड़े नेताओं के कान पर जू रेंगती! अभी तो सभी के लिए इन बच्चों की मौतें सिर्फ़ आंकड़े बन कर रह गई हैं। यहां इतने मरे...और वहां उतने मरे...बस! कुछ समय पहले जापान के एक ख़बर की हमारे मीडिया में बहुत चर्चा थी। जिसके अनुसार जापान में सिर्फ़ एक बच्ची स्कूल जा सके इसलिए स्पेशल एक ट्रेन उसके गांव तक आती थी। सिर्फ़ एक बच्ची के लिए ट्रेन! इतना महत्व दिया जाता हैं जापान में देश की एक आम बच्ची को और हमारे यहां सैकडों बच्चों के जान की कोई किंमत नहीं हैं। यहां पर सभी लोग सिर्फ़ एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में व्यस्त हैं।

सरकार की विफलता

हम इक्किसवी सदी में जी रहें हैं। हम तेजस जैसे लड़ाकू विमान बना रहे हैं, पनडुब्बियां बना रहे हैं। मुंबई में 3600 करोड़ की लागत से शिवाजी की मूर्ति और गुजरात में 2500 करोड़ की लागत से सरदार पटेल की मूर्ति बन रही हैं। लेकिन हमारे अस्पतालों में जीवनोपयोगी ज़रुरी ‘ऑक्सिजन’ की कमी हैं। निस्संदेह ये दोनों हमारे गौरव थे और सदा रहेंगे भी। इनका मोल इन पैसों से भी बढ़ कर था। लेकिन यह भी उतना ही सच हैं कि ये दोनों महापुरुष यदि आज जिंदा होते तो यहीं कहते कि अस्पताल बनाओं और अस्पतालों में ज़रुरी चीजें मुहैया करवाओ। वास्तव में अस्पतालों में बच्चों की मौतें सरकार की विफलता दर्शाती हैं। ये मौतें सभी अंतरिक्ष उडानों और मंगल यान के माथे पर लिखी हुई शर्म हैं। ये मौतें ‘सीरियल मर्डर’ करने का पुख्ता इंतजाम हैं। जिसमें, अस्पतालों ने इन बच्चों के हत्या की सुपारी ली हुई हैं। विकास के दावों एवं अच्छे दिनों के लुभावने सपनों के बावज़ूद यदि ऑक्सीजन की कमी की वजह से या डॉक्टरों की लापरवाही की वजह से इतने बच्चों की मौतें होती हैं तो धिक्कार हैं ऐसे विकास पर...धिक्कार हैं ऐसे अच्छे दिनों पर! नहीं चाहिए देश को ऐसा विकास और ऐसे अच्छे दिन!!

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ज्योति देहलीवाल जी एक गृहणी है और महाराष्ट्र में निवारसरत है। आप 2014 से ब्लॉग लिख रही है। उनके ब्लॉग पर विभिन्न विषयों से संबधित रोचक जानकारियां और सामाजिक व घरेलू टिप्स आदि ढ़ेरो जानकारीवर्द्धक लेखो की काफी लम्बी श्रृखला है। ज्योति जी से ई-मेल jyotidehliwal708@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है और उन्हे Facebook पर फालो कर सकते है।


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