16 December, 2017

पुनरावृत्ति | ब्लॉग एकलव्य


'सोज़े वतन' अब बताने हम चले 
'लेखनी' का मूल क्या ?
तुझको जताने 
हम चले !

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले ..... 

भौंकती है भूख नंगी 
मरने लगे फुटपाथ पर 
नाचती निर्वस्त्र 'द्रौपदी' 
पांडवों की आड़ में 
हाथ में चक्र है 'सुदर्शन' 
लज्जा बचाने हम चले 

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले....... 

धूप में तपते हुए 
वो हाँकता है प्रेम से 
पैरों में 'खड़ाऊँ' नहीं 
वो काँपता है,रातों में

<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए 'एकलव्य' ब्लॉग पर जाएं >>>



ध्रुव सिंह जी एक नये ब्लॉगर व लेखक है। वर्तमान में एकलव्य ब्लॉग का संचालन कर रहे है और कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते है। ब्लॉगर से dhruvsinghvns@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है।


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