18 December, 2017

रवायतों में न सही अब खिदमतों में ही.. | ब्लॉग गुफ़्तगू


किस्सागोइ न हो..इसलिए
ख्वाबों को छोड़ हम हकीकत की 
पनाह में आ गए हैं,
अजी छोड़िए.. 
उजालों को..
यहाँ पलकें भी मूंद जाती है,
अंधेरा ही सही.. 
पर आँखें तो खूल जाती है,
हमने उम्मीद कब हारी है?
नासमझी को फिर 
सिफत समझदारी से समझाने में
ही कई शब गुजारी हैं

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पम्मी सिंह जी 2015 से ब्लॉग लेखन कर रहीं है। इसके अलावा आप अन्य समूह ब्लॉगों, चर्चा मंचों एवं वेब पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय रहती है और अापका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है।


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