18 December, 2017

रिश्ते | ब्लॉग नई सोच


थोड़ा सा सब्र,
थोड़ी वफा...
थोड़ा सा प्यार,
थोड़ी क्षमा...
जो जीना जाने रिश्ते
रिश्तों से है हर खुशी...

फूल से नाजुक कोमल
ये महकाते घर-आँगन
खो जाते हैं गर  ये तो
लगता सूना सा जीवन...
        
क्या खोया क्या पाया,
नानी -दादी ने बैठे-बैठे...
यही तो हिसाब लगाया
क्या पाया जीवन में, जिसने
इनका प्यार न पाया...
      
दादाजी-नानाजी की वो नसीहत
मौसी-बुआ का प्यार...
चाचू-मामू संग सैर-सपाटे
झट मस्ती तैयार...
      
कोई हँसाए तो कोई चिढ़ाए
कोई पापा की डाँट से बचाए
जीवन के सारे गुर सीख जायें
हो अगर संयुक्त परिवार...


<<< पूरी रचना पढ़ने के लिए ब्लॉग 'नई सोच' पर जाएं >>>


सुधा देवरानी जी 2016 से ब्लॉगिग कर रहें है और अपनी कविताओं को नई सोच ब्लॉग के माध्यम से पाठको के बीच रख रहीं है। ब्लॉगर सुधा जी से ई-मेल sdevrani16@gmail.com पर स्म्पर्क किया जा सकता है। 


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